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सेवा ही परम धर्म है इनका

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  सेवा ही परम धर्म है सड़क पर चलते हुए कई बार हम ऐसे लोगों से मिलते हैं जो यूं ही सड़कों पर घूमते रहते हैं। जो मिल गया खा लिया। किसी भी जगह लेट या बैठ जाते हैं। इन लोगों के बाल बेतरतीब बढ़े हुए एवं उलझे रहते हैं। तन पर मैले कुचैले कपड़े होते हैं।‌ ना नहाने के कारण शरीर पर मैल की परतें जमा होती हैं। कई बार शरीर पर घाव होते हैं जिनमें कीड़े पड़े होते हैं।  ऐसे सब लोगों को हम पागल कह कर दुत्कार देते हैं। अपने आसपास भी भटकने नहीं देते। हमारे लिए इनका अस्तित्व समाज पर एक भार से अधिक कुछ नहीं होता है।  पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों की सेवा ही अपना सबसे बड़ा धर्म समझते हैं। डॉ. संजय कुमार शर्मा ऐसे ही एक व्यक्ति हैं। जो मानव सेवा को अपना सबसे बड़ा धर्म मानते हुए विगत 28 वर्षों से मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के मसीहा बने हुए हैं।  उनका ना तो कोई NGO है और ना ही इन्हें कोई सरकारी सहायता प्राप्त है। यह सेवा का कार्य डॉ. संजय कुमार शर्मा अपने खर्च पर करते हैं।  सड़क पर भटकते मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों को खाना देना, दवाइयां देना, उनके कपड़े बदल...

अवकाश ग्रहण की उम्र में नया आरंभ

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            अवकाश ग्रहण की उम्र में नया आरंभ अमूमन 60 साल की उम्र अपने कार्यक्षेत्र से अवकाश ग्रहण करने की मानी जाती है। लेकिन 65 साल की उम्र में एक नए क्षेत्र में कदम रखना सचमुच साहस का काम है। परंतु एस भाग्यम शर्मा जी ने ना सिर्फ यह साहस दिखाया बल्कि अपने चुने हुए क्षेत्र में अपनी एक पहचान भी बनाई। साहित्य के क्षेत्र में एस भाग्यम शर्मा जी एक प्रतिष्ठित नाम हैं। उनका जन्म 18 मार्च 1944 को तमिलनाडु के ऊटकमंड में हुआ था। उन्हें बचपन से ही साहित्य में रुचि थी। अपनी पढ़ाई के साथ साथ उन्हें जो उपन्यास व कहानी मिलती थी पढ़ लेती थीं। विवाह के बाद ससुराल में भी उन्हें पढ़ने का माहौल मिला। उनके पति स्वयं भी एक लेखक थे। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था। जिसके कारण घर में पुस्तकों के साथ तत्कालीन कई प्रसिद्ध पत्रिकाएं भी आती थीं। एस भाग्यम शर्मा जी भी उन्हें पढ़ती रहती थीं। इस तरह एक पाठिका के तौर पर उनका साहित्य से गहरा जुड़ाव था।  पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के साथ साथ एस भाग्यम शर्मा जी ने 28 साल तक शिक्षण का कार्य किया। अवकाश ग्रहण करने के बाद एस भाग्यम शर्मा...

अनोखी व्हीलचेयर

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                        अनोखी व्हीलचेयर जब कोई व्यक्ति शारीरिक चुनौती का सामना करता है तो सहायक उपकरण ही उसके जीवन को सुगम बनाते हैं। चलने फिरने में असमर्थ लोगों के लिए व्हीलचेयर एक ऐसा सहायक उपकरण होता है जिसकी सहायता से उन लोगों को आवागमन में बहुत सहायता मिलती है। एक व्हीलचेयर ऐसे व्यक्तियों को स्वावलंबी बनने में मदद करती है। परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि आज भी हमारे देश में ऐसे स्थानों की कमी है जो व्हीलचेयर का प्रयोग करने वालों को आवागमन की सुगमता प्रदान कर सकें। अधिकांश स्थानों पर सीढ़ियां होती हैं। जिन पर व्हीलचेयर का चढ़ पाना सुगम नहीं होता है। सीढ़ियां ना भी हों तो अधिकतर धरातल बहुत ऊँचे नीचे होते हैं। जिन पर व्हीलचेयर चलाना कठिन होता है। व्हीलचेयर का प्रयोग करने वालों की इन समस्याओं को समझ कर आविष्कारक और वैज्ञानिक रियाज़ रफीक़ ने एक अनोखी व्हीलचेयर का निर्माण किया है। इस अनोखी व्हीलचेयर की एक खासियत यह है कि इसकी सहायता से सीढ़ियां भी आसानी से चढ़ी जा सकती हैं। व्हीलचेयर में एक खास तरह का मेकेनिज्म प्रयोग किया गया है।...

स्वयं दिव्यांग होकर भी करते हैं सेवा

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  स्वयं दिव्यांग होकर भी करते हैं सेवा मनुष्य में हौसला और कुछ करने की चाहत हो तो कोई चीज़ कठिन नहीं है। यही मिसाल पेश की है बिहार के शांति मुकुल जी ने।‌ वह स्वयं शारीरिक रूप से अक्षम हैं फिर भी दिव्यांग जनों की सेवा में समर्पित हैं। इनका जन्म 1983 में बिहार की साहित्यिक और सांस्कृतिक राजधानी मुजफ्फरपुर में हुआ था। जन्म से ही इनका एक पैर पोलियो के कारण पैरालिसिस से ग्रस्त है। पर इनमें हिम्मत की कोई कमी नहीं थी। इन्होंने इतिहास विषय से स्नातक एवं बी.एड. की डिग्री प्राप्त की। स्वयं दिव्यांग होने के कारण अन्य दिव्यांगों की पीड़ा को समझते थे। इसलिए उन्होंने स्वयं ही दिव्यांग जनों के उत्थान के लिए काम करने का बीड़ा उठाया। शांति मुकुल स्वतंत्र रूप से दर्जनो संस्थान से जुड़े हुए हैं और दिव्यांगों की सेवा कर रहे हैं। इन्होंने कई बार रक्त दान भी किया है।  शांति मुकुल की पत्नी कुमारी सरिता भी एक हाथ व पैर से दिव्यांग हैं और अपने पति के कार्य में पूरा सहयोग करती हैं। शांति मुकुल ने अपने आप को पूरी तरह दिव्यांग जनों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। दिव्यांग जनों की भलाई के लिए उपकरण दिल...

मुसीबतों से डरें नहीं तो जीत पक्की.....

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              मुसीबतों से डरें नहीं तो जीत पक्की..... जीवन में अक्सर विपरीत परिस्थितियां आकर हमारा रास्ता रोकने का प्रयास करती हैं। कुछ लोग इन विपरीत परिस्थितियों से हार मान कर चुपचाप बैठ जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो इन विपरीत परिस्थितियों को चुनौती देते हैं। वह बिना डरे इनके पार जाकर संघर्ष का रास्ता अपनाते हैं।  जीत उन्हीं लोगों को मिलती है जो संघर्ष के रास्ते पर चलकर विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हैं।  गीता चौहान एक ऐसी ही मिसाल हैं। मात्र 6 साल की उम्र में वह पोलियो का शिकार हो गईं। उनकी चलने फिरने की शक्ति समाप्त हो गई। वह व्हीलचेयर पर आ गईं। परंतु उनका संघर्ष सिर्फ इतना ही नहीं था। ऐसी स्थिति में जब उन्हें अपने पिता के सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता थी तब उनके पिता ने उनका सहयोग करने से मना कर दिया। गीता पढ़ना चाहती थीं। शिक्षा ग्रहण कर स्वयं को योग्य बनाना चाहती थीं। किंतु उनके पिता चाहते थे कि वह घर पर रहें। उनका मानना था कि उनकी शारीरिक अक्षमता उनकी राह का रोड़ा है। पिता ने तो साथ नहीं दिया लेकिन गीता की माँ उनकी पढ़ने की ललक...

कर दिखाना है.....

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कुछ बड़ा करना है तो ज़िद ठाननी पड़ती है। आने वाली तकलीफों से डरने की जगह उनका सामना करने की हिम्मत पैदा करनी पड़ती है। अगर आप ज़िद ठान लें कि कुछ कर दिखाना है तो परेशानियां आपको डराती नहीं हैं। ऐसी ही एक ज़िद ठानी हिंदुस्तान के पारा तैराक मोहम्मद शम्स आलम शेख ने। अपने हौसले से उन्होंने अपना नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में सबसे तेज़ पारा तैराक के रूप में दर्ज़ करा लिया। वैसे तो शम्स अपने नाम पहले ही कई रिकॉर्ड्स दर्ज़ करा चुके हैं।  पर जब शम्स पता चला कि इनके राज्य बिहार में मिश्रीलाल शीतकालीन तैराकी प्रतियोगिता होने वाली है तो इन्होंने उसमें हिस्सा लेकर कुछ कर दिखाने की ठानी। इनके स्विमिंग कोच शशांक कुमार ने  बताया कि हर साल मिश्रीलाल शीतकालीन तैराकी प्रतियोगिता गंगा नदी में होती है। जो कि 8 दिसंबर 2019 को होने वाली है । पटना में आयोजित इस प्रतियोगिता में तैराक को गंगा नदी में दो किलोमीटर की दूरी तैर कर पार करनी होती है। शम्स के मन में आया कि इस प्रतियोगिता में भाग लेकर कुछ कर दिखाया जाए। पर जब इनके कोच का फोन आया था तब दिसंबर की शुरुआत हो चुकी थी। समय बहुत कम था...

मुझे उड़ान भरना ‌है

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                      मुझे उड़ान भरना ‌है मुश्किलें ‌लाख‌ रोड़े अटकाएं पर जिसमें हौसला है उसे ‌कोई भी नहीं रोक सकता है। वह तो हर मुश्किल के लिए खुद एक चुनौती बन जाता है।‌ यह बात मोहम्मद शम्स आलम शेख़ पर एकदम खरी उतरती है। शम्स को भी कठिनाइयों ने घेरने का प्रयास किया। पर इस लड़ाके ने अपनी हिम्मत से उस घेरे को ध्वस्त कर दिया। उस घेरे से वह एक विजेता के रूप में बाहर निकल कर आए। शम्स एक पैरा तैराक, प्रेरक वक्ता और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के अधिकारों के पक्षधर हैं। 17 जुलाई 1986 को बिहार के मधुबनी में जन्मे शम्स आलम का संबंध किसानों के परिवार से है। पर शम्स के नाना  अपने समय के माने हुए पहलवान थे। अपने नाना को मिलने वाली शोहरत और इज्ज़त से प्रभावित होकर शम्स भी खेलों की तरफ आकर्षित हुए। वह अपने गांव रातौस में तैराकी किया करते थे। छह साल की उम्र में शम्स पढ़ाई के सिलसिले में अपने भाई के साथ मुंबई चले गए। वहाँ जाने के बाद भी शम्स के अंदर का खिलाड़ी शांत नहीं हुआ। उन्होंने कराटे से अपना नाता जोड़ लिया। ‌कोच उमेश मुर्कर ...

मैं कमज़ोर नहीं

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जीवन में अक्सर कठिन परिस्थितियां हमारे समक्ष चुनौती पेश करती रहती हैं। यह चुनौतियां दरअसल हमें परखती हैं। क्योंकी इनसे लड़ने की ताकत हमारे भीतर ही मौजूद है। जो परिस्थितियों से घबरा कर हार नहीं मानता वह ही सही मायनों में विजेता होता है। प्रतिभा मिश्रा इस बात का उदाहरण हैं। इनके जीवन में कई समस्याएं आईं लेकिन अपनी हिम्मत से इन्होंने सभी को हरा दिया। प्रतिभा का जन्म 14 दिसंबर 1989 में बेगूसराय (बिहार) के एक छोटे से गांव में हुआ। बचपन से ही चुलबुली और हंसमुख प्रतिभा रीढ़ की हड्डी के क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण पिछले दस सालों से व्हीलचेयर पर हैं। पर अपने जज़्बे के कारण आज एक खुशहाल जीवन बिता रही हैं। उनका मानना है कि हम भले ही किसी भी स्थिति में क्यों ना हों परंतु कभी भी खुद को कमज़ोर नहीं समझें। क्योंकी हार जीत तो मन से होती है। जो मन को मजबूत बनाए रखते हैं कभी नहीं हारते हैं। एक छोटी सी उम्र से ही प्रतिभा ने जीवन में उतार चढ़ाव देखे हैं। सिर्फ सात साल की उम्र में इनकी माँ का कैंसर की बीमारी के कारण देहांत हो गया। परिवार बिखर सा गया। पिता श्री नंद किशोर मिश्र ने चारों भाई बहनों को संभा...

अपनी 'आत्मशक्ति' के कारण टिका हूँ

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अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले प्रायः अकेले पड़ जाते हैं। समाज और परिवार की तरफ से उन्हें वह सहयोग नही मिल पाता जो मिलना चाहिए। यही कारण है कि हमारे समाज में न्याय देर से मिलता है। जबकी जो लोग भी अन्याय के विरुद्ध लड़ते हैं उसमें केवल उनका स्वार्थ नही होता। वह लड़ाई दरअसल हमारी अपनी लड़ाई होती है।  मास्टर विजय सिंह पिछले दो दशकों से एक ऐसी ही लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी सरकार से मांग है कि उनके गांव की लगभग 4000 बीघा जमीन जिस पर भूमि माफिया का कब्ज़ा है मुक्त कर दी जाए। पिछले 21 वर्षों से मुजफ्फर नगर कलेक्ट्रेट के गलियारे में इस अन्याय के विरुद्ध धरने पर बैठे हैं।  इनके गांव चौसाना मे दबंगो का बोलबाला था। गरीबों को न्याय नही मिलता था। सरकारी भूमि व योजनाओ को दबंग लोग हड़प लेते थे। एक दिन जब विजय सिंह स्कुल से घर आ रहे था एक पाँच साल का बच्चा अपनी माँ से कह रहा था कि माँ किसी के घर से आटा ले आओ। ताकि शाम को तो रोटी बन सके। बच्चे के शब्दों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उस रात उन्हें नींद नही आई।  विजय जी ने इस विषय  में कुछ करने की ठानी। अपने शिक्षक पद से त्याग ...

मुश्किलें ना हों तो जीने का मज़ा क्या है

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  ज़िंदगी खूबसूरत है. परंतु इसकी खूबसूरती बढ़ जाती है जब हम इसके द्वारा पेश किए गए इम्तिहानों में सफल होते हैं. ज़िंदगी की चुनौतियां का सामना कर हम जीवन को पूर्णता में जीना सीखते हैं. मो. इमरान कुरैशी इस बात का उदाहरण हैं कि पीड़ा के बिना सार्थक जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है. 26 साल के इमरान 2009 से व्हीलचेयर पर हैं लेकिन इससे इनके जज़्बे में कोई कमी नहीं आई है. इमरान व्हीलचेयर स्पोर्ट्स जैसे बास्केट बॉल , बैडमिंटन मैराथन आदि खेलते हैं. इसके अलावा यह नृत्य और तैराकी भी करते हैं. देखते ही देखते किसी की भी तस्वीर कागज़ पर उतार देने का हुनर भी इनके पास है. इमरान मल्टीपल एक्सक्लोरोसिस नामक बीमारी का शिकार हैं. 17 साल की उम्र तक उनके जीवन में सब कुछ सामान्य था. 2007 में अचानक इनकी आँख की रौशनी चली गई. लखनऊ के PGI में दिखाया गया. करीब 25 दिन के इलाज से आँखें ठीक हो गईं. जब सब ठीक लगने लगा तब 2009 में इनके पैर सुन्न पड़ने लगे. डॉक्टरों ने बताया कि अब इमरान कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकते. इमरान का जन्म सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश में रहने वाले किसान परिवार में हुआ ...

देश के लिए ओलंपिक पदक जीतना चाहता हूँ

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मध्यप्रदेश भोपाल के रहने वाले प्रणय खरे का सपना देश के लिए ओलंपिक पदक जीतने का है. डी.पी.एस. भोपाल की नवीं कक्षा के छात्र प्रणय मध्यप्रदेश अकादमी द्वारा चयनित एक प्रतिभाशाली घुड़सवार हैं. अपने बड़े भाई प्रांजल से इन्हें घुड़सवारी करने की प्रेरणा मिली. प्रांजल और प्रणय की उम्र में 10 साल का अंतर है. प्रांजल द्वारा प्रेरित करने पर प्रणय मध्यप्रदेश राज्य घुड़सवारी अकादमी में अभ्यास करना आरंभ कर दिया. 22 अप्रैल 2002 को जन्मे 8 साल की उम्र से घुड़सवारी कर रहे हैं. प्रणय के पिता प्रवीण खरे एक व्यवसायी हैं. माता डॉ. प्रीती खरे बहुमुखी प्रतिभा की स्वामिनी हैं. वह एक समाज सेविका, साहित्यकार एवं व्यवसायी हैं. इसके अलावा वह रेडियो तथा दूरदर्शन पर उद्घोषिका भी हैं. प्रणय एक प्रतिभाशाली घुड़सवार हैं. घुड़सवारी जैसे खतरनाक खेल में इस छोटी सी उम्र में प्रणय ने अपने से बड़े खिलाडिय़ों से भी अपना लोहा मनवा लिया है. प्रणय ने अभी तक कई बड़ी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेकर जीत का परचम लहराया है. इस खेल में इन्होंने {32}स्वर्ण, {16 }रजत एवं {10} कांस्य तथा अतिप्रतिष्...

जीवन के संघर्ष ने सिखाया लिखना

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मनुष्य जब संघर्ष की भट्टी में स्वयं को तपाता है तभी वह कुंदन बन कर उभरता है. ओमप्रकाश क्षत्रिय जी ने भी जीवन की चुनौतियों का सामना करके ही स्वयं को लेखन के क्षेत्र में प्रतिस्थापित किया है. 26 जनवरी 1965 को मध्यप्रदेश के भानपुरा जिले में आपका जन्म एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ. पिता श्री केशवराम परमानंद क्षत्रिय ग्वालियर रियासत में सिपाही थे. माता सुशीलाबाई क्षत्रिय एक धार्मिक विचारों की महिला थीं. बचपन से ही आपका जीवन संघर्षमय रहा. स्वयं को शिक्षित करने के लिए आपने किसी भी वैध काम को करने में संकोच नहीं किया. यहीं से कर्मठता आपके चरित्र का अभिन्न हिस्सा बन गई.  लेखन में आपकी रुचि बचपन से ही थी. छोटी उम्र से ही आपकी रचनाएं पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं. अपनी हर प्रकाशित रचना को काट कर आप संग्रहित कर लेते थे. एक बार पिता ने उन्हें रद्दी कागज़ जान कर बेंच दिया. जब ओमप्रकाश जी ने बताया "बाबूजी वो मेरी रचनाएं थी.” तो उन्होंने बड़ी सहजता से कहा "तो क्या हुआ और लिख लेना."  ओमप्रकाश जी ने बिना साहस खोए पुनः सृजन आरंभ कर दिया. 1984 में आपने हायर सेकेंड्री की परी...

दैनिक जीवन की विसंगतियों को देखकर लिखने की प्रेरणा मिलती है

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अपनी लघुकथाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों, कथनी और करनी के फ़र्क एवं गिरते मूल्यों पर कुठाराघात करने का काम पवन जैन जी बड़ी ही कुशलता से करते हैं. अपने लेखन के जरिए आप की कोशिश ह्रासित होते जीवन मूल्यों की रक्षा करना एवं समाज को नई दिशा दिखाना है. आप मानव स्वभाव को पढने में माहिर हैं. इसी कारण आप की लघुकथाओं के पात्र काल्पनिक नहीं वरन वास्तविक प्रतीत होते हैं. अपनी लघुकथाओं के माध्यम से आप लोगों के मन में विचारों की एक श्रृंखला को जन्म देने में सफल रहते हैं. पवन जी का जन्म 1 जनवरी 1954 को मध्यप्रदेश के सागर शहर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था. डाक्टर सर हरीसिंग गौर विश्व विद्यालय से आपने विज्ञान विषय से स्नातक तत्पश्चात जबलपुर विश्व विद्यालय से विधि स्नातक एवं अर्थ शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की. विद्यार्थी जीवन से  ही आप सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उत्साह पूर्वक भाग लेते रहे.  1977 से  आप बैंक सेवा में रहे.  विभिन्न पदों पर रहते हुए दिसंबर  2013 में  बैंक  से सेवा निवृत हुए. बैंक सेवा के दौरान आप राजभाषा विभाग सेे जु...

ग्रामीण परिवेश की सादगी मेरे लेखन में झलकती है

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श्री अनिल शूर आज़ाद का लेखन जीवन के बहुत करीब है. ग्रामीण परिवेश में बचपन व्यतीत होने का असर है कि जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण बहुत खुला हुआ है. गांव की सादगी आपके जीवन के साथ साथ लेखन में भी झलकती है. अनिल जी के लेखन की शुरुआत एक रोचक प्रसंग से हुई. बात वर्ष 1978 के अंतिम दिनों की है जब अनिल जी रेवाड़ी(हरियाणा) के निकट रामपुरा गांव के बलबीर सिंह अहीर हायर सेकेंडरी स्कूल  की नवीं कक्षा का विद्यार्थी थे. एक बार इनके अध्यापक श्री बंशीधर जी ने ' छात्र-असंतोष ' विषय पर निबंध याद करने के लिए कहा. लेकिन अनिल जी ने निबंध याद नहीं किया. अपनी घोषणानुसार मास्टर जी ने लिखित परीक्षा ली. मास्टर जी पिटाई करने में कोई कसर नहीं रखते थे. अतः अनिल जी ने अपनी समझ से जोड़-जाड़कर दो पेज का निबंध तो लिख दिया किंतु डर था कि ज्यादा नहीं तो दो चार डंडे तो खाने ही पड़ेंगे. परंतु अगले दिन आप को बेहद आश्चर्य हुआ जब मास्टर जी ने पिटाई करने की बजाय अपने पास बुलाकर आपके मौलिक लेखन की पूरी कक्षा के समक्ष तारीफ की व लेख पढ़कर भी सुनाया. बस इस प्रोत्साहन ने इनके लेखन की प्रतिभा को फलने फूलने का अवसर प्र...

मेरे लिए लेखन अनुभूति से अभिव्यक्ति का सफर है

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 "मैं लिखती हूँ क्योंकि लेखन मेरे लिए सांस लेने जैसा है. इसके बिना मैं जी नहीं सकती हूँ."  यह कहना है कथाकार-कवयित्री कमल कपूर जी का. लेखन से आपको नैसर्गिक लगाव है. इसी कारण इनके लेखन में एकरसता की शुष्कता नहीं बल्कि विविधता की सरसता है. आपके लेखन में प्रकृति की अनुपम छठा देखने को मिलती है. लेखन इनके लिए अपने जीवन की अनुभूतियों को शब्दों में पिरोने का माध्यम है. इनकी प्रेरणास्रोत इनकी साहित्यिक गुरु चित्रा मुदगिल जी हैं. वैसे तो बहुत छोटी उम्र से लेखन कर रही हैं लेकिन 1998 से विधिवत सक्रिय हैं. कमल जी अपने लेखन के माथ्यम से अंधविश्वासों , बेमानी रूढ़ियों , कुरीतियों तथा बीमार मानसिकता जैसी विसंगतियों पर कुठाराघात करती हैं. इन बुराइयों का बहिष्कार कर नई स्वस्थ परंपराएं स्थापित करने पर जोर देती हैं. इनके लेखन के विषय सदैव आसपास के परिवेश से लिए जाते हैं तथा समकालीन घटनाओं पर आधारित होते हैं. कमल जी अपनी अनुभूतियों को शब्दों के जरिए कागज पर उतारती हैं. जिसके कारण पाठकों को अाकर्षित करने में सफल हैं. देश विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिक...