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अनोखी व्हीलचेयर

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                        अनोखी व्हीलचेयर जब कोई व्यक्ति शारीरिक चुनौती का सामना करता है तो सहायक उपकरण ही उसके जीवन को सुगम बनाते हैं। चलने फिरने में असमर्थ लोगों के लिए व्हीलचेयर एक ऐसा सहायक उपकरण होता है जिसकी सहायता से उन लोगों को आवागमन में बहुत सहायता मिलती है। एक व्हीलचेयर ऐसे व्यक्तियों को स्वावलंबी बनने में मदद करती है। परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि आज भी हमारे देश में ऐसे स्थानों की कमी है जो व्हीलचेयर का प्रयोग करने वालों को आवागमन की सुगमता प्रदान कर सकें। अधिकांश स्थानों पर सीढ़ियां होती हैं। जिन पर व्हीलचेयर का चढ़ पाना सुगम नहीं होता है। सीढ़ियां ना भी हों तो अधिकतर धरातल बहुत ऊँचे नीचे होते हैं। जिन पर व्हीलचेयर चलाना कठिन होता है। व्हीलचेयर का प्रयोग करने वालों की इन समस्याओं को समझ कर आविष्कारक और वैज्ञानिक रियाज़ रफीक़ ने एक अनोखी व्हीलचेयर का निर्माण किया है। इस अनोखी व्हीलचेयर की एक खासियत यह है कि इसकी सहायता से सीढ़ियां भी आसानी से चढ़ी जा सकती हैं। व्हीलचेयर में एक खास तरह का मेकेनिज्म प्रयोग किया गया है।...

स्वयं दिव्यांग होकर भी करते हैं सेवा

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  स्वयं दिव्यांग होकर भी करते हैं सेवा मनुष्य में हौसला और कुछ करने की चाहत हो तो कोई चीज़ कठिन नहीं है। यही मिसाल पेश की है बिहार के शांति मुकुल जी ने।‌ वह स्वयं शारीरिक रूप से अक्षम हैं फिर भी दिव्यांग जनों की सेवा में समर्पित हैं। इनका जन्म 1983 में बिहार की साहित्यिक और सांस्कृतिक राजधानी मुजफ्फरपुर में हुआ था। जन्म से ही इनका एक पैर पोलियो के कारण पैरालिसिस से ग्रस्त है। पर इनमें हिम्मत की कोई कमी नहीं थी। इन्होंने इतिहास विषय से स्नातक एवं बी.एड. की डिग्री प्राप्त की। स्वयं दिव्यांग होने के कारण अन्य दिव्यांगों की पीड़ा को समझते थे। इसलिए उन्होंने स्वयं ही दिव्यांग जनों के उत्थान के लिए काम करने का बीड़ा उठाया। शांति मुकुल स्वतंत्र रूप से दर्जनो संस्थान से जुड़े हुए हैं और दिव्यांगों की सेवा कर रहे हैं। इन्होंने कई बार रक्त दान भी किया है।  शांति मुकुल की पत्नी कुमारी सरिता भी एक हाथ व पैर से दिव्यांग हैं और अपने पति के कार्य में पूरा सहयोग करती हैं। शांति मुकुल ने अपने आप को पूरी तरह दिव्यांग जनों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। दिव्यांग जनों की भलाई के लिए उपकरण दिल...

मुसीबतों से डरें नहीं तो जीत पक्की.....

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              मुसीबतों से डरें नहीं तो जीत पक्की..... जीवन में अक्सर विपरीत परिस्थितियां आकर हमारा रास्ता रोकने का प्रयास करती हैं। कुछ लोग इन विपरीत परिस्थितियों से हार मान कर चुपचाप बैठ जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो इन विपरीत परिस्थितियों को चुनौती देते हैं। वह बिना डरे इनके पार जाकर संघर्ष का रास्ता अपनाते हैं।  जीत उन्हीं लोगों को मिलती है जो संघर्ष के रास्ते पर चलकर विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हैं।  गीता चौहान एक ऐसी ही मिसाल हैं। मात्र 6 साल की उम्र में वह पोलियो का शिकार हो गईं। उनकी चलने फिरने की शक्ति समाप्त हो गई। वह व्हीलचेयर पर आ गईं। परंतु उनका संघर्ष सिर्फ इतना ही नहीं था। ऐसी स्थिति में जब उन्हें अपने पिता के सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता थी तब उनके पिता ने उनका सहयोग करने से मना कर दिया। गीता पढ़ना चाहती थीं। शिक्षा ग्रहण कर स्वयं को योग्य बनाना चाहती थीं। किंतु उनके पिता चाहते थे कि वह घर पर रहें। उनका मानना था कि उनकी शारीरिक अक्षमता उनकी राह का रोड़ा है। पिता ने तो साथ नहीं दिया लेकिन गीता की माँ उनकी पढ़ने की ललक...

कर दिखाना है.....

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कुछ बड़ा करना है तो ज़िद ठाननी पड़ती है। आने वाली तकलीफों से डरने की जगह उनका सामना करने की हिम्मत पैदा करनी पड़ती है। अगर आप ज़िद ठान लें कि कुछ कर दिखाना है तो परेशानियां आपको डराती नहीं हैं। ऐसी ही एक ज़िद ठानी हिंदुस्तान के पारा तैराक मोहम्मद शम्स आलम शेख ने। अपने हौसले से उन्होंने अपना नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में सबसे तेज़ पारा तैराक के रूप में दर्ज़ करा लिया। वैसे तो शम्स अपने नाम पहले ही कई रिकॉर्ड्स दर्ज़ करा चुके हैं।  पर जब शम्स पता चला कि इनके राज्य बिहार में मिश्रीलाल शीतकालीन तैराकी प्रतियोगिता होने वाली है तो इन्होंने उसमें हिस्सा लेकर कुछ कर दिखाने की ठानी। इनके स्विमिंग कोच शशांक कुमार ने  बताया कि हर साल मिश्रीलाल शीतकालीन तैराकी प्रतियोगिता गंगा नदी में होती है। जो कि 8 दिसंबर 2019 को होने वाली है । पटना में आयोजित इस प्रतियोगिता में तैराक को गंगा नदी में दो किलोमीटर की दूरी तैर कर पार करनी होती है। शम्स के मन में आया कि इस प्रतियोगिता में भाग लेकर कुछ कर दिखाया जाए। पर जब इनके कोच का फोन आया था तब दिसंबर की शुरुआत हो चुकी थी। समय बहुत कम था...

मुझे उड़ान भरना ‌है

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                      मुझे उड़ान भरना ‌है मुश्किलें ‌लाख‌ रोड़े अटकाएं पर जिसमें हौसला है उसे ‌कोई भी नहीं रोक सकता है। वह तो हर मुश्किल के लिए खुद एक चुनौती बन जाता है।‌ यह बात मोहम्मद शम्स आलम शेख़ पर एकदम खरी उतरती है। शम्स को भी कठिनाइयों ने घेरने का प्रयास किया। पर इस लड़ाके ने अपनी हिम्मत से उस घेरे को ध्वस्त कर दिया। उस घेरे से वह एक विजेता के रूप में बाहर निकल कर आए। शम्स एक पैरा तैराक, प्रेरक वक्ता और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के अधिकारों के पक्षधर हैं। 17 जुलाई 1986 को बिहार के मधुबनी में जन्मे शम्स आलम का संबंध किसानों के परिवार से है। पर शम्स के नाना  अपने समय के माने हुए पहलवान थे। अपने नाना को मिलने वाली शोहरत और इज्ज़त से प्रभावित होकर शम्स भी खेलों की तरफ आकर्षित हुए। वह अपने गांव रातौस में तैराकी किया करते थे। छह साल की उम्र में शम्स पढ़ाई के सिलसिले में अपने भाई के साथ मुंबई चले गए। वहाँ जाने के बाद भी शम्स के अंदर का खिलाड़ी शांत नहीं हुआ। उन्होंने कराटे से अपना नाता जोड़ लिया। ‌कोच उमेश मुर्कर ...

मैं कमज़ोर नहीं

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जीवन में अक्सर कठिन परिस्थितियां हमारे समक्ष चुनौती पेश करती रहती हैं। यह चुनौतियां दरअसल हमें परखती हैं। क्योंकी इनसे लड़ने की ताकत हमारे भीतर ही मौजूद है। जो परिस्थितियों से घबरा कर हार नहीं मानता वह ही सही मायनों में विजेता होता है। प्रतिभा मिश्रा इस बात का उदाहरण हैं। इनके जीवन में कई समस्याएं आईं लेकिन अपनी हिम्मत से इन्होंने सभी को हरा दिया। प्रतिभा का जन्म 14 दिसंबर 1989 में बेगूसराय (बिहार) के एक छोटे से गांव में हुआ। बचपन से ही चुलबुली और हंसमुख प्रतिभा रीढ़ की हड्डी के क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण पिछले दस सालों से व्हीलचेयर पर हैं। पर अपने जज़्बे के कारण आज एक खुशहाल जीवन बिता रही हैं। उनका मानना है कि हम भले ही किसी भी स्थिति में क्यों ना हों परंतु कभी भी खुद को कमज़ोर नहीं समझें। क्योंकी हार जीत तो मन से होती है। जो मन को मजबूत बनाए रखते हैं कभी नहीं हारते हैं। एक छोटी सी उम्र से ही प्रतिभा ने जीवन में उतार चढ़ाव देखे हैं। सिर्फ सात साल की उम्र में इनकी माँ का कैंसर की बीमारी के कारण देहांत हो गया। परिवार बिखर सा गया। पिता श्री नंद किशोर मिश्र ने चारों भाई बहनों को संभा...

अपनी 'आत्मशक्ति' के कारण टिका हूँ

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अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले प्रायः अकेले पड़ जाते हैं। समाज और परिवार की तरफ से उन्हें वह सहयोग नही मिल पाता जो मिलना चाहिए। यही कारण है कि हमारे समाज में न्याय देर से मिलता है। जबकी जो लोग भी अन्याय के विरुद्ध लड़ते हैं उसमें केवल उनका स्वार्थ नही होता। वह लड़ाई दरअसल हमारी अपनी लड़ाई होती है।  मास्टर विजय सिंह पिछले दो दशकों से एक ऐसी ही लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी सरकार से मांग है कि उनके गांव की लगभग 4000 बीघा जमीन जिस पर भूमि माफिया का कब्ज़ा है मुक्त कर दी जाए। पिछले 21 वर्षों से मुजफ्फर नगर कलेक्ट्रेट के गलियारे में इस अन्याय के विरुद्ध धरने पर बैठे हैं।  इनके गांव चौसाना मे दबंगो का बोलबाला था। गरीबों को न्याय नही मिलता था। सरकारी भूमि व योजनाओ को दबंग लोग हड़प लेते थे। एक दिन जब विजय सिंह स्कुल से घर आ रहे था एक पाँच साल का बच्चा अपनी माँ से कह रहा था कि माँ किसी के घर से आटा ले आओ। ताकि शाम को तो रोटी बन सके। बच्चे के शब्दों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उस रात उन्हें नींद नही आई।  विजय जी ने इस विषय  में कुछ करने की ठानी। अपने शिक्षक पद से त्याग ...