पूर्ण समर्पण
ईश्वर अनुभूति का विषय है न की वाद विवाद का अतः ईश्वर तक पहुँचने का सर्वोत्तम मार्ग है पूर्ण समर्पण का भाव। पूर्ण समर्पण केवल प्रेम से ही संभव है। प्रेम की वह परम स्तिथि जहां व्यक्ति संसारिकता को त्याग कर सिर्फ प्रभु चरणों में स्वयं को समर्पित कर देता है भक्ति कहलाती है।
भक्ति का प्रारंभ ईश्वर के प्रति आकर्षण से होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे सांसारिक प्रेम का आरम्भ प्रेमी के प्रति आकर्षण से होता है। व्यक्ति निरंतर ईश्वर का चिंतन करता है। यह निरंतर चिंतन ही प्रेम का आधार बनता है। व्यक्ति का हर प्रयास ईश्वर को प्रसन्न करने का होता है। ईश्वर का पूजन अर्चन करना, उन्हें स्नान कराना, भोग अर्पित करना इत्यादि द्वारा वह ईश्वर की सेवा करता है।
यह तो प्रारंभिक अवस्था के लक्षण हैं। चरम अवस्था तो तब आती है जब व्यक्ति बृज की गोपियों की भांति अपना सर्वस्व ईश्वर को अर्पण करने को तत्पर हो जाता है। जिनके लिए कृष्ण को प्रसन्न रखने के अतिरिक्त को और प्रयोजन नहीं था। उन्हें लोक निंदा तक की परवाह नहीं थी।
धीरे धीरे वह स्तिथि आ जाती है जहाँ समस्त संसार ईश्वरमय लगने लगता है। यही भक्ति की अंतिम स्तिथि है। इसके बाद भक्त के लिए अपना पराया, मित्र शत्रु कुछ नहीं रह जाता। उसे सभी में ईश्वर के दर्शन होते हैं।
भक्त के जीवन में चाहें कितने ही उतार चढ़ाव आयें। उसे चाहें कितने ही कष्ट क्यों न झेलने पड़ें किन्तु वह अपनी भक्ति से नहीं डिगता। उसे ईश्वर पर पूर्ण आस्था रहती है। उसकी भक्ति उसे शक्ति प्रदान करती है।
भक्ति के कई रंग होते हैं। कोई ईश्वर की दास भाव से सेवा करता है तो कोई प्रेमी की भांति उन्हें रिझाता है। कोई पुत्रवत स्नेह करता है तो कोई सखा भाव रखता है। रूप कोई भी हो वही प्रेम भक्ति कहलाता है जो स्वार्थरहित हो।
अतः ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव पैदा करें। यह आपको जीवन के परम लक्ष्य को पाने में सहायता करेगा।
भक्ति का प्रारंभ ईश्वर के प्रति आकर्षण से होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे सांसारिक प्रेम का आरम्भ प्रेमी के प्रति आकर्षण से होता है। व्यक्ति निरंतर ईश्वर का चिंतन करता है। यह निरंतर चिंतन ही प्रेम का आधार बनता है। व्यक्ति का हर प्रयास ईश्वर को प्रसन्न करने का होता है। ईश्वर का पूजन अर्चन करना, उन्हें स्नान कराना, भोग अर्पित करना इत्यादि द्वारा वह ईश्वर की सेवा करता है।
यह तो प्रारंभिक अवस्था के लक्षण हैं। चरम अवस्था तो तब आती है जब व्यक्ति बृज की गोपियों की भांति अपना सर्वस्व ईश्वर को अर्पण करने को तत्पर हो जाता है। जिनके लिए कृष्ण को प्रसन्न रखने के अतिरिक्त को और प्रयोजन नहीं था। उन्हें लोक निंदा तक की परवाह नहीं थी।
धीरे धीरे वह स्तिथि आ जाती है जहाँ समस्त संसार ईश्वरमय लगने लगता है। यही भक्ति की अंतिम स्तिथि है। इसके बाद भक्त के लिए अपना पराया, मित्र शत्रु कुछ नहीं रह जाता। उसे सभी में ईश्वर के दर्शन होते हैं।
भक्त के जीवन में चाहें कितने ही उतार चढ़ाव आयें। उसे चाहें कितने ही कष्ट क्यों न झेलने पड़ें किन्तु वह अपनी भक्ति से नहीं डिगता। उसे ईश्वर पर पूर्ण आस्था रहती है। उसकी भक्ति उसे शक्ति प्रदान करती है।
भक्ति के कई रंग होते हैं। कोई ईश्वर की दास भाव से सेवा करता है तो कोई प्रेमी की भांति उन्हें रिझाता है। कोई पुत्रवत स्नेह करता है तो कोई सखा भाव रखता है। रूप कोई भी हो वही प्रेम भक्ति कहलाता है जो स्वार्थरहित हो।
अतः ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव पैदा करें। यह आपको जीवन के परम लक्ष्य को पाने में सहायता करेगा।
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