अमीरी और गरीबी

अमीरी और गरीबी। मानव समाज से ये दो शब्द गहराई से जुड़े हुए हैं। बहुधा अमीरी और गरीबी को तय करने के लिए व्यक्ति की आर्थिक स्तिथि को मानदंड बनाया जाता है। वह व्यक्ति जो आर्थिक रूप से सक्षम है। जिसके पास पैसा, अपना मकान, कार इत्यादि हो वह अमीर और जिसके पास यह सब ना  हो वह गरीब माना जाता है।

पैसा मानव जीवन का आवश्यक अंग है। इसके आभाव में व्यक्ति जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर पाता है। यही कारण है की जीवन के लिए ज़रूरी चार पदार्थों में एक अर्थ भी माना गया है। अतः व्यक्ति के लिए अर्थ का सर्जन आवश्यक है। इसके आभाव में व्यक्ति के जीवन में अनेक विषमताएं आ जाती हैं। व्यक्ति सुचारू रूप से अपना तथा अपने परिवार का पालन नहीं कर सकता है। बच्चों को उचित शिक्षा नहीं मिल पाती है जिसके कारण वो जीवन में आगे नहीं बढ़ पाते हैं। कई बार कुंठाग्रस्त होकर वो सही पथ से च्युत हो जाते हैं। इसका प्रभाव समाज पर पड़ता है। गरीबी किसी भी समाज के लिए अभिशाप होती है। इसके कारण समाज में कई कुरीतियाँ जन्म लेती हैं। अतः गरीबी का उन्मूलन ही किसी भी समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए।

किन्तु बहुत अधिक दौलत भी बहुधा अभिशाप बन जाती है। समाज में विलासिता बढती है, जीवन मूल्यों का ह्रास  होता है। जिस से समाज का नैतिक पतन होता है। कई बार अमीर व्यक्ति की संतान भी अत्यधिक सुविधायें मिलाने के कारण बुरी संगत में पड़  कर भटक जाती है। 

अतः आवश्यकता संतुलित स्तिथि बनाये रखने की है। धन  न तो बहुत अधिक अधिक हो और न ही आवश्यकता से कम। आवश्यकता की परिभाषा तय करते समय हमे सावधानी बरतनी पड़ेगी। आवश्यकताओं और इच्छाओं के  अंतर को समझना होगा। 

जीवन में पैसों के अतिरिक्त एक और पूँजी की ज़रुरत होती है। उचित जीवन मूल्यों की। अतः उनका सर्जन भी आवश्यक है।

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