जीवन का लक्ष्य

इस सृष्टि के दो प्रमुख अंग हैं 
  • प्रकृति 
  • जीव 
प्रकृति जड़ स्वरुप है जबकि जीव चेतन स्वरुप। दोनों ही प्रकृति एवं जीव काल से बंधे हैं। काल का चक्र अनवरत चलता रहता है। दोनों प्रकृति और जीव इसकी गति के साथ साथ कर्म में लगे रहते हैं। प्रकृति के क्रिया कलाप जैसे ग्रह नक्षत्रों का संचालन, ऋतुओं का परिवर्तन अबाध गति से चलता रहता है। प्रकृति की भांति जीव भी अपने कर्मों में संलग्न हैं। इन कार्यों द्वारा जीव स्वयं के शरीर का पोषण करता है, आत्म रक्षा करता है, शरीर को नई उर्जा देता है एवं संतान उत्पन्न करता। दूसरे शब्दों में आहार, निद्रा, आत्मरक्षा एवं मैथून ये चार लक्षण प्रत्येक जीव में पाए जाते हैं।
प्रकृति और जीव दोनों का ही नियंता ईश्वर है। काल भी उसके आधीन है। ईश्वर अनादि और अनंत है। वह सत चित आनंद रूप है। इस सृष्टि के समस्त चर एवं अचर प्राणियों का पिता ईश्वर ही है। ईश्वर की अनुभूति तीन रूपों में होती है 
  1. सर्वव्यापी शक्ति के रूप में जो कि प्रकृति के कण कण में व्याप्त हैं। 
  2.  परमात्मा के रूप में जो सभी जीवों के ह्रदय में निवास करते हैं और एक मित्र की भांति दिशा निर्देश करते हैं। 
  3. समस्त ऐश्वर्यों से युक्त भगवान रूप में जो सम्पूर्ण सृष्टि के कारण हैं। 


मनुष्य जो जीवों में सर्वश्रेष्ठ की चेतना सबसे अधिक विकसित होती है। अतः चार मूलभूत क्रियाओं के अतिरिक्त ज्ञान अर्जित करना उसका प्रमुख उद्देश्य है। सृष्टि के अनसुलझे रहस्यों को जानने के लिए वह प्रारंभ से ही प्रयत्नशील रहा है। उसके इसी प्रयास का परिणाम इस विश्व में दिखाई देने वाली समस्त भौतिक उन्नति है। किन्तु मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य आध्यात्मिक उन्नति है। अपने वास्तविक स्वरुप को पहचान कर ईश्वर से स्वयं का संबंध स्थापित करना ही मानव जीवन की सदगति है। किन्तु भौतिक जगत पर अपना प्रभुत्व जमाने की चाह में वह जीवन के परम लक्ष्य को भूल गया है। अतः मनुष्य को उसके लक्ष्य की अनुभूति कराने की परम आवश्यकता है।

इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए समय समय पर संत महात्माओं का अविर्भाव होता रहा है जिन्होंने साधारण जन के बीच ईश्वर भक्ति का प्रचार प्रसार किया। इस प्रयास में उन्हें कई कष्ट भी उठाने पड़े किन्तु लोगों की भलाई के लिए उन्होंने सब कुछ सहन कर लिया।


ईश्वर की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया भी तीन चरणों में विभाजित है 

  1. ईश्वर को जानना :- मनुष्य शास्त्रों के अध्यन, श्रवण के माध्यम से ईश्वर के विषय में जानकारी प्राप्त करता है। यह भक्ति का प्रारंभ है। 
  2. ईश्वर का चिंतन :- ईश्वर के विषय में जानने के बाद मनुष्य उनके ऐश्वर्य, रूप, गुण इत्यादि के बारे में सोंचता है। उनके पावन नाम का जाप करता है।  इस अवस्था में वह भक्ति पथ पर आगे बढ़ने लगता है।
  3. ईश्वर की अनुभूति :- यह भक्ति की चरम सीमा है।  यहाँ व्यक्ति आध्यात्मिकता के शिखर पर होता है जहां से वह प्रत्येक जीव एवं पदार्थ में ईश्वर के दर्शन करता है। 

समय रुपी नदी की धारा में जीव अनंत काल से बह रहा है। इस यात्रा में अपने कर्म फल के अनुसार विभिन्न शरीर धारण करता है। इस यात्रा का लक्ष्य परम सत्य की अनुभूति करना है ताकि जन्म मरण के इस चक्र मुक्ति पाकर वह ईश्वर का सानिध्य पा सके। मानव रूप में इस उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती है। अतः हमें अपने जीवन की उपियोगिता को समझ कर इसे व्यर्थ नहीं गवाना चाहिए। वरन ईश्वर तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए।







टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

यादें

एक बुनकर जो देश को बना रहा है 'डिजिटली' साक्षर

तत् त्वम् असि