मुक्ति के लिए आंदोलन



इक्कीसवीं सदी में जब हम देश के विश्व शक्ति बनने का सपना देख रहे हैं वहीं हमारे समाज में कुछ लोग अभी भी सर पर मैला ढोने (मल को सर पर रख कर ले जाने) को मजबूर हैं. उन्हें समाज के भेदभाव पूर्ण रवैये को झेलना पड़ता है. इन लोगों की सुनवाई करने वाला भी कोई नही होता है. शहर में रहने वाले अधिकांश लोगों को लगता है कि ऐसी कोई प्रथा आज भारत में जीवित नही है. जबकी कई जगहों पर आज भी यह प्रथा कायम है.
इस कुप्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाने तथा इस काम से जुड़े लोगों के हितों के लिए लड़ने का काम कर रहे हैं 'बेज़वाड़ा विल्सन'. अपने इस काम के लिए इन्हें 27 जुलाई 2016 को प्रसिद्ध रेमन मैगसेसे सम्मान { Ramon Magsaysay Award} देने की घोषणा की गई है.
बेज़वाड़ा का जन्म 1966 में कर्नाटक में हुआ था. इनके माता पिता सफाई कर्मचारी थे व मैला ढोने का काम करते थे. इस प्रथा से मुक्ति पाने के उद्देश्य से उन्होंने बेज़वाड़ा को पढ़ने के लिए भेजा. किंतु यहाँ उन्हें सहपाठियों के उपहास व भेदभाव से पूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ा. स्नातक होने के बावजूद भी बेज़वाड़ा को किसी और काम के योग्य नही समझा गया. इस बात से आहत होकर इन्होंने अपने तथा अपने समाज के हकों के लिए लड़ने की ठानी.


सदियों से चली आ रही सर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने हेतु बेज़वाड़ा ने कई लोगों को पत्र लिखे, अधिकारियों तथा नेताओं से मिले. मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री तक से इस प्रथा को समाप्त करने की गुहार लगाई. कई सालों के अथक प्रयासों के बाद 1993 में संसद में इस कुप्रथा को समाप्त करने का अध्यादेश पारित कर गैरकानूनी करार दिया गया.
इतने प्रयासों के बाद भी स्थितियां नही बदलीं. बेज़वाड़ा पुनः प्रयास में जुट गए. जब एक दैनिक अखबार में सर पर मैला ढोते लोगों के चित्र छपे तब सरकार ने आदेश दिए कि पुराने शौचालयों को हटा कर ऐसे शौचालय बनवाए जाएं जिनमें मल के सही निकास की वयवस्था हो. 
1994 में बेज़वाड़ा आंध्रप्रदेश आ गए. यहाँ अपने साथियों पॉल दिवाकर तथा एस आर  शंकरन के साथ मिल कर 'सफाई कर्मचारी आंदोलन' की शरुआत की.  इसका उद्देश्य सफाई कर्मचारियों को इस काम से हटा कर उनका पुनर्वास करना था. 2003 में बेज़वाड़ा तथा सफाई कर्मचारी आंदोलन ने इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की. इसका परिणाम यह हुआ कि सरकारों को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना पड़ा. तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस प्रथा को राष्ट्रीय लज्जा घोषित किया.
बेजंवाड़ा को 2009 में मानव अधिकार संरक्षण के लिए Ashoka Senior fellow चुना गया.
आज भी बेज़वाड़ा का संघर्ष जारी है. जब तक इस काम को पूरी तरह बंद कर इससे जुड़े लोगों का पुनर्वास नही होता उनका संघर्ष चलता रहेगा.

यह लेख Jagaranjunction.com पर प्रकाशित है।

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