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संघर्षों को चुनौती

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संघर्षों को चुनौती एक दलित स्त्री जो पोलियो से पीड़ित हो।  उसका संघर्ष तीन तरफा हो जाता है।  किंतु फिर भी इन्होंने हार नहीं मानी।  सभी संघर्षों को डट कर चुनौती दी।  एेसे  साहस की मिसाल हैं गौरी कुमार।  बिहार के मुंगेर जिले में जन्मी गौरी के पिता एक सफाई कर्मचारी थे।  बचपन में वह पोलियोग्रस्त हो गईं।  घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी किंतु उनकी माँ चाहती थीं कि वह पढा़ई करें।  लेकिन घर पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पडा़ जब उनकी माँ की मृत्यु हो गई और पिता का काम भी छूट गया।  फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।  सरकारी छात्रवृत्ति की मदद से उन्होंने पढा़ई जारी रखी और एक वकील बनीं।  अपने पेशे को उन्होंन दलितों और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा में प्रयोग किया।  अपने जिले के स्थानीय चुनाव में खडी़ हुईं और 5 वर्षों तक ward council के सदस्य के तौर पर कार्य किया।  वह बिहार की पहली दलित महिला वकील थीं जिन्हे Juvenile Justice Board के सदस्य के रूप में चुना गया।  उन्होंने राजनीति में कदम जमाने का प्रयास किया किंतु वह माह...

जज्बे को सलाम

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जज्बे को सलाम  अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित अमित कुमार सरोहा का जज़्बा तरीफ़ के काबिल है।  22 वर्ष की आयु में एक कार दुर्घटना में इनकी रीढ़ की हड्डी में लगी चोट ने इन्हें सदा के लिए Wheelchair पर बैठा दिया।  लेकिन अदम्य साहस के धनी अमित के हौंसले को झुका नहीं पाई।  आज अमित सभी के लिए प्रेरणा के स्तंभ हैं।  दुर्घटना से पूर्व अमित राष्ट्रीय स्तर के उभरते हुए हॉकी खिलाडी़ थे।  लेकिन दुर्घटना ने उनके चलने फिरने पर भी पाबंदी लगा दी।  कुछ समय निराशा में बीता किंतु शीघ्र ही अमित ने यह जान लिया की भले ही वह शारीरिक रूप से कमजो़र हो गए हों किंतु यदि वह मन से हार न माने तो बहुत कुछ कर सकते हैं।  अमेरिकी Wheelchair Rugby खिलाडी़ Jonathan Sigworth जो भारत में Para sports को प्रचलित करने आए थे, से मुलाकात के बाद अमित ने अपनी प्रतिभा को पहचाना।  इन्होंने Discus Throw, Club Throw, Javeline Throw प्रतियोगितओं के लिए स्वयं को तैयार किया।  अपने पहले ही National games में इन्होंने Silver medal जीता।   इसके बाद तो अमित ने कभी पीछे मुड़ कर न...

रक्षा बंधन और उसकी कथायें

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रक्षा बंधन और उसकी कथायें भारत में भाई बहन के प्रेम को दर्शाता पर्व है रक्षा बंधन।  श्रावण मास की पूर्णिमा को बहनें अपने भाइयों की कलाई पर एक धागा बांधती हैं जो उनके प्रेम का प्रतीक होता है। बदले में भाई अपनी बहनों की रक्षा का वचन देते हैं।   सदियों से राखी का त्यौहार हमारे देश में बनाया जाता रहा है।  इसके मनाए जाने के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं।   सबसे प्राचीन कथा देवासुर संग्राम के समय की है।  जब असुरों का पलडा़ भारी पड़ने लगा तब देवराज इंद्र देवताओं के गुरू बृहस्पति के पास गए और देवों की रक्षा का उपाय पूँछा।  बृहस्पति ने उन्हें एक अभिमंत्रित धागा दिया।  जिसे इंद्र की पत्नी शची ने उनकी भुजा पर बांध दिया और देवों की विजय हुई।   एक और पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने असुरराज बली से तीनों लोक ले लिए तो बलि ने उनसे प्रार्थना की कि भगवान विष्णु उसके साथ उसके महल में रहें।  भगवान विष्णु ने उसकी बात मान ली और उसके महल में रहने चले गए।  यह बात देवी लक्ष्मी को अच्छी नही लगी।  उन्होंने रक्षा सूत्र बांध कर महारज बल...

नंगे पांव सफलता के पथ पर

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नंगे पांव सफलता के पथ पर  डॉ. सूर्य बाली का कहना है कि वो रोज़ नंगे पांव 11km. पैदल चल कर स्कूल जाते थे।  जौनपुर उत्तर प्रदेश के बैरिली गाँव में गोंड जनजाति में जन्मे डॉ. सूर्य बाली अपने गाँव के प्रथम डॉक्टर हैं।  उनका डॉक्टर बनने का सफर संर्घषों से भरा है।   इनके पिता एक बंधुआ मज़दूर थे। उस जीवन से तंग आकर वह घर छोड़कर चले गए।  उनकी माँ लोगों के घरों में सफाई करना, खाना बनना, बर्तन धोने का काम करती थीं।  जब तक उनके पिता नहीं लौटे तब तक उनकी छोटी सी कमाई से ही घर चलता था।  किंतु उनमें पढ़ने की ललक थी. गाँव की प्राथमिक पाठशाला में वह पढ़ने जाते थे।  फीस तो नहीं पड़ती थी किंतु पुस्तकों के लिए वह बेर तथा अन्य फलों को एकत्रित कर उन्हें शहर के लोगों से पुस्तकों से बदल लेते थे।  किंतु कुछ शिक्षकों का व्यवहार उनके प्रति अच्छा नहीं था। उन्हें प्रोत्साहित करने की बजाय वह उन्हें यह कह कर हतोत्साहित करने का प्रयास करते कि पढ़ लिख कर क्या करोग तुम्हें तो अपने माँ बाप की तरह काम करना चाहिए।  किंतु पढा़ई के प्रति उनकी लगन के कारण वह इन बा...

ईमानदारी की मिसाल

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ईमानदारी की मिसाल अक्सर लोगों को लगता है कि पैसे की तंगी ईमान को डिगा देती है किंतु राजस्थान के रिक्शाचालक आबिद कुरैशी ने ईमानदारी की मिसाल प्रस्तुत करते हुए 1 लाख 17000 की रकम वापस कर दी।  यह रकम उन्हे एक पॉलीथीन बैग में सड़क के किनारे जयपुर  Government hostel के पास पडी़ मिली।  रात के 10 बजे तक उन्होंने इंतजा़र किया कि शायद जिसके पैसे हैं वह ढूंढ़ता हुआ आ जाए. किंतु जब कोई नहीं आया तो वह घर चले गए।  सामान ढोने का रिक्शा चलाने वाले आबिद रोजा़ना 200 से 300 रु. कमाते हैं।  जिससे मुश्किल से घर चल पाता है।  अपनी नन्हीं बेटी की पढा़ई और शादी के लिए वह रकम जोड़ रहे हैं।  इस पर भी एक बार भी उनका ईमान नहीं डोला।  रकम को पुलिस स्टेशन ले जाने में वह डर रहे थे कि कहीं पुलिस उन पर ही शक ना करे।  अतः वह रकम घर ले आए किंतु उन्हें और उनकी पत्नी को रात भर नींद नहीं आई।  सुबह जब उन्होंने अपने पडो़सियों से बात की तो सबने यही कहा कि वह पैसे पुलिस को देने की बजाय स्वयं रख लें।  किंतु उन्हें कुरान शरीफ़ की हिदायत याद थी कि ईमानदारी सबसे ब...

सर उठा के जियो

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सर उठा के जियो Head held high foundation एक ऐसी संस्था है जिसका उद्देश्य अशिक्षित एवं बेरोज़गार लोगों को शिक्षा, कौशल और रोज़गार के सही अवसर प्रदान कर गरीबी दूर करना है।  इससे गाँवों मे रहने वाले गरीब अशिक्षित लोगों को यह मौका मिलता है कि वह अपनी पसंद का काम कर इज्ज़त से सर उठा कर जी सकें।  इस संस्था का सिद्धांत है कि यदि लोगों को सही अवसर प्रदान किए जायें तो वह स्वयं ही गरीबी को मात दे सकते हैं।    2007 में सुनील सवारा समिक घोष अजित सतपुते और राजेश भट ये चारों एक विचार लेकर साथ में आए। उन्होंने तय किया कि पिछडे़ ग्रामीण इलाकों से अशिक्षित या कम पढे़ लिखे लोगों को लेकर उन्हें अंग्रेजी़ कंप्यूटर तथा अन्य क्षेत्रों में प्रशिक्षित कर इन्हें रोज़गार उपलब्ध कराया जाए जिससे उन्हें सम्मानपू्र्वक जीवन यापन का अवसर मिल सके।  पहली बार में उन्होंने 8 लोगों का चयन किया।  आठ महिने से भी कम समय में उनका प्रशिक्षण पूरा हो ग़या. 2008 में एक BPO का निर्माण किया गया जो प्रशिक्षण प्राप्त लोगों को नौकरी दिलाने का काम करता है।  इस संस्था द्वारा अब तक कई लोगों के जीवन...

तिनका तिनका तिहाड़

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तिनका तिनका तिहाड़ जब कभी जेल का जि़क्र आता है तो जे़हन में सींखचों के पीछे कै़द खूंखार मुजरिमों की तस्वीर उभरती है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि जेल की चारदीवारी के पीछे भी ज़िंदगी बसती है।  जेल में बंद कै़दियों के ह्रदय में भी भावनाओं का उफान उठता है।  सींखचों के पीछे से झांकती आंखों में भी सपने पलते हैं।  जेल में रहने वाला हर शख़्स खूंखार मुजरिम नहीं होता।  उनमें से अधिकांश हालातों का शिकार होकर जुर्म कर बैठते हैं।  बाहर की दुनिया में रहने वाले हम लोग अपने दृष्टिकोंण से उनका आंकलन करते हैं।  जब बात महिला कैदियों की आती है तो हमारी आलोचना और तीव्र हो जाती है। हम महात्मा गांधी की वह सीख भूल जाते हैं 'पाप से घृणा करो पापी से नहीं' । उसी प्रकार हमें अपराधियों के स्थान पर अपराध से किनारा करना चाहिए।  आवश्यक्ता है उनके जीवन में झांक कर देखने की।  उनके सुख दुख को समझने की।  एसा ही एक प्रयास किया है तिहाड़ जेल की महानिदेशक विमला मेहरा और संवेदनशील लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता वर्तिका नंदा ने। इन्होंने तिहाड़ जेल की महिला कैदियों के दिल में झ...