मजदूर से सरपंच तक का सफर




यह दुनिया बहुत ही अद्भुत है. यहाँ अक्सर ही ऐसा देखने या सुनने को मिलता है जो हमें चौंका देता है.
अक्सर हम देखते हैं कि लोग हालातों के से हार मान लेते हैं. अन्याय के साथ समझौता कर लेते हैं. किंतु इन्हीं के बीच से अक्सर ऐसे लोग उभर कर आते हैं जो हालात के आगे घुटने टेकने की बजाय उसे बदल देते हैं. अन्याय का शिकार बनने की बजाय उसके खिलाफ आवाज उठाते हैं.
राजस्थान अजमेर के किशनगढ़ तहसील के हरमादा गांव की नौरोती देवी की कहानी भी ऐसे ही संघर्ष की कहानी है.
दलित समाज में जन्मी नौरोती अशिक्षित एवं बेहद गरीब थीं. अपना पेट पालने के लिए वह सडंक निर्माण के लिए पत्थर तोड़ने का काम करती थीं. उन्होंने देखा कि उन लोगों को मिलने वाली मजदूरी में घपला किया जाता है. अतः अपने साथ के मजदूरों को संगठित कर उन्होंने इसके विरूद्ध आवाज उठाई. उनके इस संघर्ष में एक स्वयंसेवी संस्था भी उनके साथ जुड़ गई. मामला सुप्रीम कोर्ट गया. नौरोती देवी और अन्य मजदूर केस जीत गए.
इस जीत ने नौरोती देवी को एक नया बल दिया. लेकिन उन्होंने अनुभव किया कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के लिए शिक्षा एक उपयोगी हथियार है.
अतः उन्होंने अपने गांव से 4Km. दूर स्थित तिलोनिया गांव के Barefoot college के प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम में दाखिला लिया. Barefoot college एक ऐसी संस्था है जो लोगों की शिक्षा प्रशिक्षण तथा अन्य सामाजिक मुद्दों पर काम करती है. इसकी स्थापना 1972 में बंकेर राय द्वारा की गई थी. अपनी मेहनत व लगन से जल्द ही वह सब सीख गईं तथा वहाँ पर काम करने लगीं.
अपने नेतृत्व कर सकने की क्षमता के कारण उन्होंने आस पास की महिलाओं को संगठित कर शिक्षा तथा उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना आरंभ किया. वक्त के साथ कदम मिलाते हुए उन्होंने कंप्यूटर चलाने का भी प्रशिक्षण लिया.
उनकी ख्याति दिनों दिन बढ़ने लगी. उनके कार्यों से प्रभावित होकर उनके गांव के लोगों ने उनसे सरपंच पद का चुनाव लड़ने का आग्रह किया. 2010 में वह चुनाव जीत कर हरमादा गांव की सरपंच बन गईं.
अपने पांच सालों के कार्यकाल में नौरोती देवी ने गांव के विकास के अनेक काम किए जैसे कि कुएं तालाब आदि का निर्माण, हैंड पंप लगवाना, शौचालय बनवाना आदि. इसके अलावा उनकी लड़ाई शराब माफिया के साथ भी रही.
Barefoot college ने पंचायत के दफ्तर में कंप्यूटर लगवा दिया. नौरोती देवी सारी अर्जियां उसी पर टाइप कर लेती थीं. Internet की सहा़यता से वह अनेक जानकारियां हासिल कर गांव वालों का ज्ञान बढ़ाती थीं.
2015 में राजस्थान पंचायती राज बिल में हुए संशोधन के अनुसार सरपंच का आठवीं पास होना आवश्यक है. अतः उन्होंने अगला चुनाव नही लड़ा.
20 वर्ष से भी अधिक समय तक नौरोती देवी ने अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी. अब सत्तर साल से अधिक हो जाने के कारण शरीर थक गया है
किंतु हौंसला कम नही हुआ. अपने कंप्यूटर ज्ञान को और बढ़ा कर अब वह लोगों को कंप्यूटर चलाने का प्रशिक्षण देती हैं.
एक बार पंचायत सचिव ने उनसे पूंछा कि अघिक शिक्षित ना होकर भी आप कंप्यूटर चलाना कैसे सीख गईं. नौरोती देवी ने जवाब दिया कि आप लोगों के पास साधन तथा अवसर दोनों ही थे किंतु मेरे पास यह नही थे. अतः मैंने अपनी इच्छाशक्ति एवं परिश्रम से कंप्यूटर चलाना सीख लिया.

यह लेख Jagranjunction.com पर प्रकाशित हुआ है।

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