दशरथ मांझी एक प्रेरणा
दृढ संकल्प से आप कुछ भी कर सकते हैं। इसका उदहारण हैं दशरथ मांझी। बिहार के गया जिले में जन्मे दशरथ मांझी ने अपने अथक प्रयास से पहाड़ का सीना चीर कर उसमें से रास्ता बनाया। यह काम उन्होंने महज छेनी और हतौड़ी की मदद से किया। इस काम में उन्हें २२ वर्ष लगे।
उनके गाँव में एक पहाड़ था जिसके कारण लोगों को एक बहुत लम्बा चक्कर लगा कर पहाड़ के उस पार काम के लिए जाना पड़ता था। किसी के बीमार पड़ने पर उसे अस्पताल ले जाने में भी दिक्कत पेश आती थी। इसी कारण उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी को भी अपनी जान गवानी पड़ी। सभी परेशान थे किन्तु कोई कुछ नहीं करता था।
दशरथ ने निश्चय किया कि वो पहाड़ काट कर उसमे से रास्ता बनाएंगे। लोगों ने उनका मजाक बनाया क्योंकि वहां बिजली भी नहीं थी। यह काम हाथों से छेनी और हतौडी की सहायता से ही हो सकता था। किन्तु लोगों के तानो की परवाह ना कर उन्होंने अपना कार्य आरम्भ किया। उनके दृढ निश्चय को देख लोगों में भी बदलाव आया और मजाक उड़ाने की बजाय उनकी सहायता करने लगे। २२ वर्षों के कड़े परिश्रम से उन्होंने असंभव को संभव कर दिया।
उनका जन्म मुसाहार जाती में जो महादलितों में गिनी जाती है हुआ था। वो एक भूमिहीन मज़दूर थे जिनके लिए दो वक़्त की रोटी जुटाना भी कठिन था। किन्तु फिर भी उन्होंने निश्वार्थ सेवा का बीड़ा उठाया। उनका यह कृत्य प्रशंसनीय है। १७ अगस्त २००७ को कैंसर से लड़ते हुए उनकी मृत्यु हो गयी।

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