गूंज की गूंज


२०१५ के Ramon Magasaysay पुरस्कार से सम्मानित अंशू गुप्ता ने भारत में दान की परंपरा को गौरवशाली बना दिया है। रोटी कपडा़ और मकान इन तीन मूलभूत सुविधाओं में से कपडे़ के महत्व को समझते हुए उन्होंने कपडों के दान पर जोर दिया।  इसके लिए उन्होंने गूंज नाम की एक स्वयंसेवी संस्था का निर्माण किया. यह संस्था लोगों से पुराने कपडे़ लेकर उन्हें लोगों की आवश्यक्ता के अनुसार उपयोगी सामान में या उनके प्रयोग के अनुसार बदल देती है।  उनकी संस्था इस बात का ध्यान रखती है कि इन सामानों को लेने वालों के सम्मान को कोई ठेस न पहुँचे.अतः लोगों को उनके काम के बदले में उनकी आवश्यक्ता का सामान दिया जाता है। इससे लोगों की गरिमा बनी रहती है। 


एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे अंशू ने अपने मकसद की प्राप्ति के लिए अपने कैरियर को भी दांव पर लगा दिया।  उन्होंने महसूस किया कि कपड़ा जो मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है पर सबसे कम धयान दिया जाता है। ठण्ड  के मौसम में बहुत से लोग बिना सही कपड़ों के कारण सर्दी लगने से मर जाते हैं। हमारे समाज में हम अक्सर उन लोगों को जो गरीब और बेघर हैं अपने कपडे़ और सामान जो हमारे उपयोग का नहीं होता दान कर देते हैं। यह अक्सर उपयोग के योग्य नही होता।  आपदाओं के समय हम बहुत सा सामान दान देते हैं किन्तु उसमें से बहुत सा सामान सही प्रबंधन के आभाव में बेकार चला जाता है।  इस बात को ध्यान रखते हुए अंशू ने गूंज की नींव डाली। 
गूंज ने कई बार आपदाओं के समय देश के उन नागरिकों  की मदद की जो मुसीबत में थे। उनके इन्हीं सराहनीय कार्यों के कारण उन्हें एशिया के नोबेल कहे जाने वाले Ramon Magasaysay से सम्मानित किया गया है। 

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