चल अकेला
चल अकेला
यदि आप सोंचते हैं कि एक अकेला आदमी क्या कर सकता है तो आपके इस संदेह को गलत साबित कर दिखाया है Forest man कहे जाने वाले एक शख्स ने जिनका नाम है जादव मोलाई पेंग। मोलाई असम की मीशिंग जनजाति से हैं। ये एक पर्यावरण संरक्षक हैं। 1979 से यह अकेले ही मजूली द्वीप पर वृक्षारोपण कर रहे हैं। स्वयं ही उनका संरक्षण करते हैं। इस प्रकार इन्होंने वहाँ की बलुई भूमि पर अमेरिका के Central Park से भी बडा़ एक वन खडा़ कर दिया है. इसका क्षेत्रफल 1360 एकड़ है। Molai forest (असमिया में मोलाई कठोनी ) के नाम से विख्यात यह वन असम के जोरहट जिले में कोकिलामुख नामक स्थान के पास है। 1979 में गोलघाट जिले में वन विभाग द्वारा जब अरुणा चपोरी नामक स्थान पर जो कि कोकिलामुख से 5km. दूर है 200 hectares के क्षेत्र में वृक्षारोपण का काम आरंभ किया तब मोलाई भी वहाँ मज़दूरी करते थे। प्रोजक्ट की समाप्ति पर जब सब चले गए तो भी मोलाई वहीं रह कर उन वृक्षों की देखभाल करने लगे तथा साथ ही साथ नए वृक्ष भी रोपित करते रहे। इस प्रकार उन्होंने उस क्षेत्र को सघन वन में बदल दिया। मोलाई वन कई प्रकार के वन्य जीवों एवं पक्षियों को संरक्षण प्रदान करता है।
मोलाई चाहते हैं कि वह अन्य स्थानों पर भी इसी प्रकार वन लगाएं। वह वन में अपनी पत्नी बिनीता और तीन बच्चों के साथ रहते हैं। उनके पास कुछ गाय तथा भैंसे हैं जिनका दूध बेंच कर वह अपनी जीविका चलाते हैं।
उन्होंने यह काम बिना किसी सरकारी या गैरसरकारी सहायता के किया।
उनके अद्भुत कार्य के लिए भारत सरकार द्वारा 2015 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
यदि आप सोंचते हैं कि एक अकेला आदमी क्या कर सकता है तो आपके इस संदेह को गलत साबित कर दिखाया है Forest man कहे जाने वाले एक शख्स ने जिनका नाम है जादव मोलाई पेंग। मोलाई असम की मीशिंग जनजाति से हैं। ये एक पर्यावरण संरक्षक हैं। 1979 से यह अकेले ही मजूली द्वीप पर वृक्षारोपण कर रहे हैं। स्वयं ही उनका संरक्षण करते हैं। इस प्रकार इन्होंने वहाँ की बलुई भूमि पर अमेरिका के Central Park से भी बडा़ एक वन खडा़ कर दिया है. इसका क्षेत्रफल 1360 एकड़ है। Molai forest (असमिया में मोलाई कठोनी ) के नाम से विख्यात यह वन असम के जोरहट जिले में कोकिलामुख नामक स्थान के पास है। 1979 में गोलघाट जिले में वन विभाग द्वारा जब अरुणा चपोरी नामक स्थान पर जो कि कोकिलामुख से 5km. दूर है 200 hectares के क्षेत्र में वृक्षारोपण का काम आरंभ किया तब मोलाई भी वहाँ मज़दूरी करते थे। प्रोजक्ट की समाप्ति पर जब सब चले गए तो भी मोलाई वहीं रह कर उन वृक्षों की देखभाल करने लगे तथा साथ ही साथ नए वृक्ष भी रोपित करते रहे। इस प्रकार उन्होंने उस क्षेत्र को सघन वन में बदल दिया। मोलाई वन कई प्रकार के वन्य जीवों एवं पक्षियों को संरक्षण प्रदान करता है।
मोलाई चाहते हैं कि वह अन्य स्थानों पर भी इसी प्रकार वन लगाएं। वह वन में अपनी पत्नी बिनीता और तीन बच्चों के साथ रहते हैं। उनके पास कुछ गाय तथा भैंसे हैं जिनका दूध बेंच कर वह अपनी जीविका चलाते हैं।
उन्होंने यह काम बिना किसी सरकारी या गैरसरकारी सहायता के किया।
उनके अद्भुत कार्य के लिए भारत सरकार द्वारा 2015 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।


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