कर्म मुक्ति का उपाय
प्रायः लोग कहते हैं की मनुष्य ईश्वर के हाथ की कठपुतली है जिसकी डोर उसके हाथों में है। वह जैसे चाहता है हमें नचाता है।
अतः प्रश्न उठता है की यदि हम सच में ईश्वर के हाथ की कठपुतली हैं और वह हमें अपने हिसाब से नचा रहा है तो फिर कर्म के सिद्धांत का क्या महत्व है। फिर कैसे हम अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी हैं।
एक सोंच यह भी है की जीवन में सब कुछ पूर्वनिर्धारित है। जो होना है वह होकर रहेगा। यदि ऐसा है तो फिर कर्म का जीवन में कोई स्थान ही नहीं है। कर्म का सिद्धांत निरर्थक है। क्योंकि फिर न तो हमारे लिए करने को कुछ है और न ही हम किसी कार्य के प्रति उत्तरदायी हैं। क्योंकि हुआ वही जो होना था।
किन्तु स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कर्म के सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। श्री कृष्ण कहते हैं की मनुष्य को किसी भी परिस्तिथि में अकर्म में लिप्त नहीं होना चाहिए। कर्म ही जीव का धर्म है। जीव के गुण के अनुसार उसका कर्म पृथक पृथक हो सकता है। सतोगुणी मनष्य सत्कर्म करता है। रजोगुणी मनुष्य अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर उनकी पूर्ति के लिए कर्म करता है। तमोगुणी मनुष्य सदैव बुरे कर्मों के प्रति आकर्षित होता है। किन्तु अपने अपने गुणों के आधार पर सभी कर्म में लिप्त हैं। जैसा व्यक्ति का कर्म होता है उसी के अनुसार उसे फल प्राप्त होता है। अपने कर्म फल का भोग करने हेतु उसे बार बार जन्म लेना पड़ता है। मुक्ति का एकमात्र उपाय निष्काम कर्म है।
किसी भी परिस्तिथि में बिना कर्म के जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण कर्म स्थली के रूप में ही किया है। अतः पशु पक्षी, पेड़ पौधे, कीट पतंगे सब ही अपने नियत कर्म में लगे हुए हैं।
मनुष्य जो सभी जीवों में श्रेष्ठ है, को कर्म द्वारा सदगति पाने का सर्वाधिक अवसर प्राप्त है। मनुष्य का यह कर्त्तव्य है की वह किसी भ्रान्ति में पड़कर अकर्म के लिए प्रेरित न हो।
कर्म का सिद्धांत हमें एक आशा प्रदान करता है। हम चाहें किसी भी परिस्तिथि में हों कर्म के द्वारा उससे बाहर आ सकते हैं। अतः हमें हार मान कर कर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए।
हम ईश्वर के हाथ की कठपुतली नहीं हैं। न ही वह हमें अपने अनुसार नचा रहा है। हम उस परमात्मा के अंश हैं फिर इतने निरीह कैसे हो सकते हैं।
ईश्वर को हमें किसी भी बंधन में बांधने की आवश्यकता नहीं है। उसने हमें कर्म की पूर्ण स्वतंत्रता दे रखी है।
ईश्वर तो उस स्नेही पिता की तरह है जो अपने बालक को सुदृढ बनाने हेतु उसे जीवन की जटिलताओं का सामना करने के लिए घर से बाहर भेजता है किन्तु हर समय उसकी रक्षा हेतु तत्पर रहता है। बालक पर कोई विपत्ति आने पर वह उसकी रक्षा करने दौड़ पड़ता है। अन्यथा उसे अपने अनुसार जीवन जीने के लिए छोड़ देता है। ईश्वर भी सदैव एक मित्र की भांति हमारे साथ रहता है। आवश्यकता पड़ने पर हमारा मार्गदर्शन करने हेतु उचित संकेत भेजता है। किन्तु हमारे कर्मों में हस्तक्षेप नहीं करता है। हमें पूरा अवसर देता है की हम अपने कर्मों के माध्यम से अपनी मुक्ति का मार्ग खोज सकें।
अतः प्रश्न उठता है की यदि हम सच में ईश्वर के हाथ की कठपुतली हैं और वह हमें अपने हिसाब से नचा रहा है तो फिर कर्म के सिद्धांत का क्या महत्व है। फिर कैसे हम अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी हैं।
एक सोंच यह भी है की जीवन में सब कुछ पूर्वनिर्धारित है। जो होना है वह होकर रहेगा। यदि ऐसा है तो फिर कर्म का जीवन में कोई स्थान ही नहीं है। कर्म का सिद्धांत निरर्थक है। क्योंकि फिर न तो हमारे लिए करने को कुछ है और न ही हम किसी कार्य के प्रति उत्तरदायी हैं। क्योंकि हुआ वही जो होना था।
किन्तु स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कर्म के सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। श्री कृष्ण कहते हैं की मनुष्य को किसी भी परिस्तिथि में अकर्म में लिप्त नहीं होना चाहिए। कर्म ही जीव का धर्म है। जीव के गुण के अनुसार उसका कर्म पृथक पृथक हो सकता है। सतोगुणी मनष्य सत्कर्म करता है। रजोगुणी मनुष्य अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर उनकी पूर्ति के लिए कर्म करता है। तमोगुणी मनुष्य सदैव बुरे कर्मों के प्रति आकर्षित होता है। किन्तु अपने अपने गुणों के आधार पर सभी कर्म में लिप्त हैं। जैसा व्यक्ति का कर्म होता है उसी के अनुसार उसे फल प्राप्त होता है। अपने कर्म फल का भोग करने हेतु उसे बार बार जन्म लेना पड़ता है। मुक्ति का एकमात्र उपाय निष्काम कर्म है।
किसी भी परिस्तिथि में बिना कर्म के जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण कर्म स्थली के रूप में ही किया है। अतः पशु पक्षी, पेड़ पौधे, कीट पतंगे सब ही अपने नियत कर्म में लगे हुए हैं।
मनुष्य जो सभी जीवों में श्रेष्ठ है, को कर्म द्वारा सदगति पाने का सर्वाधिक अवसर प्राप्त है। मनुष्य का यह कर्त्तव्य है की वह किसी भ्रान्ति में पड़कर अकर्म के लिए प्रेरित न हो।
कर्म का सिद्धांत हमें एक आशा प्रदान करता है। हम चाहें किसी भी परिस्तिथि में हों कर्म के द्वारा उससे बाहर आ सकते हैं। अतः हमें हार मान कर कर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए।
हम ईश्वर के हाथ की कठपुतली नहीं हैं। न ही वह हमें अपने अनुसार नचा रहा है। हम उस परमात्मा के अंश हैं फिर इतने निरीह कैसे हो सकते हैं।
ईश्वर को हमें किसी भी बंधन में बांधने की आवश्यकता नहीं है। उसने हमें कर्म की पूर्ण स्वतंत्रता दे रखी है।
ईश्वर तो उस स्नेही पिता की तरह है जो अपने बालक को सुदृढ बनाने हेतु उसे जीवन की जटिलताओं का सामना करने के लिए घर से बाहर भेजता है किन्तु हर समय उसकी रक्षा हेतु तत्पर रहता है। बालक पर कोई विपत्ति आने पर वह उसकी रक्षा करने दौड़ पड़ता है। अन्यथा उसे अपने अनुसार जीवन जीने के लिए छोड़ देता है। ईश्वर भी सदैव एक मित्र की भांति हमारे साथ रहता है। आवश्यकता पड़ने पर हमारा मार्गदर्शन करने हेतु उचित संकेत भेजता है। किन्तु हमारे कर्मों में हस्तक्षेप नहीं करता है। हमें पूरा अवसर देता है की हम अपने कर्मों के माध्यम से अपनी मुक्ति का मार्ग खोज सकें।
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