अम्मा
अम्मा
आज मेरी माँ स्वर्गीय श्रीमती आनंद कुमारी त्रिवेदी की पुण्य तिथी है। आठ वर्ष पूर्व वह हमें छोड़ कर चली गईं। किंतु उनकी स्मृतियां सदैव मेरे साथ रहेंगी और मुझे संबल प्रदान करेंगी।
उन्होंने मुझे जीवन तो प्रदान किया ही किंतु उसे उपयोगी बना सकूं उसके योग्य भी बनाया। किसी के जीवन को उपयोगी और अर्थपूर्ण बनाने में शिक्षा का विशेष महत्व होता है। लेकिन मेरी शारीरिक अवस्था में शिक्षा का महत्व और अधिक था। इस बात को समझते हुए उन्होंने मुझे शिक्षित करने का निश्चय किया। यह कार्य आसान नहीं था। मुझे रोज स्कूल पहुँचाना और छुट्टी में वापस लाना उन्हें मेरे छोटे भाई तथा दो बडी़ बहनों की परवरिश करने के साथ साथ एक गृहणी के अन्य कर्तव्य भी निभाने पड़ते थे। इस काम में मेरे पिता भाई तथा बहनों का भी सहयोग प्राप्त हुआ। किंतु इस कठिन कार्य का प्रारंभ करने का श्रेय मेरी माँ को ही जाता है।
इस कार्य में सबसे पहली मुश्किल मेरे स्कूल के दाखिले में आई। बचपन में मैं बहुत ही दुर्बल था। अतः स्कूल के प्रधानाचार्य को इस बात का संदेह था कि मैं शिक्षा प्राप्त करने के योग्य हूँ भी कि नही। अतः मेरी माँ ने मुझे घर पर ही इतना पढ़ा दिया कि जब दाखिले के लिए मेरी परीक्षा ली गई तो उन्हें कोई संदेह नहीं रह गया। जिस कक्षा में मुझे प्रवेश मिला मुझे उससे अधिक आता था।
उनके प्रयासों के कारण ही मैं B.Com तक शिक्षा प्राप्त कर पाया। आज उसी शिक्षा के कारण ही मैं इस योग्य हूँ कि अपनी बात को आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ। शिक्षा के कारण ही Tutions पढा़ कर कुछ धन अर्जन भी कर लेता हूँ।
उनके जीवन काल में मैं बहुत सी बातों के लिए उन पर आश्रित था। लेकिन उन्होंने कभी भी मेरे समक्ष इस बात की फ़िक्र नहीं जताई कि उनके ना रहने पर मेरा क्या होगा। मुझसे सदैव यही कहा कि यदि ईश्वर पर पूर्ण आस्था रखते हुए विवेक से काम लिया जाए तो किसी भी परिस्थिति से पार पाया जा सकता है। उनकी यही सीख मुझे बल देती है।
आज मेरी माँ स्वर्गीय श्रीमती आनंद कुमारी त्रिवेदी की पुण्य तिथी है। आठ वर्ष पूर्व वह हमें छोड़ कर चली गईं। किंतु उनकी स्मृतियां सदैव मेरे साथ रहेंगी और मुझे संबल प्रदान करेंगी।
उन्होंने मुझे जीवन तो प्रदान किया ही किंतु उसे उपयोगी बना सकूं उसके योग्य भी बनाया। किसी के जीवन को उपयोगी और अर्थपूर्ण बनाने में शिक्षा का विशेष महत्व होता है। लेकिन मेरी शारीरिक अवस्था में शिक्षा का महत्व और अधिक था। इस बात को समझते हुए उन्होंने मुझे शिक्षित करने का निश्चय किया। यह कार्य आसान नहीं था। मुझे रोज स्कूल पहुँचाना और छुट्टी में वापस लाना उन्हें मेरे छोटे भाई तथा दो बडी़ बहनों की परवरिश करने के साथ साथ एक गृहणी के अन्य कर्तव्य भी निभाने पड़ते थे। इस काम में मेरे पिता भाई तथा बहनों का भी सहयोग प्राप्त हुआ। किंतु इस कठिन कार्य का प्रारंभ करने का श्रेय मेरी माँ को ही जाता है।
इस कार्य में सबसे पहली मुश्किल मेरे स्कूल के दाखिले में आई। बचपन में मैं बहुत ही दुर्बल था। अतः स्कूल के प्रधानाचार्य को इस बात का संदेह था कि मैं शिक्षा प्राप्त करने के योग्य हूँ भी कि नही। अतः मेरी माँ ने मुझे घर पर ही इतना पढ़ा दिया कि जब दाखिले के लिए मेरी परीक्षा ली गई तो उन्हें कोई संदेह नहीं रह गया। जिस कक्षा में मुझे प्रवेश मिला मुझे उससे अधिक आता था।
उनके प्रयासों के कारण ही मैं B.Com तक शिक्षा प्राप्त कर पाया। आज उसी शिक्षा के कारण ही मैं इस योग्य हूँ कि अपनी बात को आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ। शिक्षा के कारण ही Tutions पढा़ कर कुछ धन अर्जन भी कर लेता हूँ।
उनके जीवन काल में मैं बहुत सी बातों के लिए उन पर आश्रित था। लेकिन उन्होंने कभी भी मेरे समक्ष इस बात की फ़िक्र नहीं जताई कि उनके ना रहने पर मेरा क्या होगा। मुझसे सदैव यही कहा कि यदि ईश्वर पर पूर्ण आस्था रखते हुए विवेक से काम लिया जाए तो किसी भी परिस्थिति से पार पाया जा सकता है। उनकी यही सीख मुझे बल देती है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें