ये कहाँ आ गए हम........

ये कहाँ आ गए हम........
आज मैने एक अजीब सा मंजर देखा. गांधी जी की प्रतिमा के नीचे बैठे एक गाय को रोते देखा. इस अजीब दृश्य को देखकर मुझसे रहा नही गया. मैने उससे पूंछा कि वह क्यों रो रही है. 
डबडबाई आंखों से मेरी तरफ देख कर वह बोली " मैं पशुओं में सबसे सीधी मानी जाती हूँ. बिना किसी भेदभाव के सबको अपना दूध पिलाती हूँ. जब तक संकट ना हो सींग भी नही चलाती हूँ. मैं तो हर कौम की माँ हूँ. लेकिन मेरा नाम लेकर लोगों ने एक निर्दोष को पीट पीट कर मार दिया. मेरा तो कलेजा फटा जा रहा है. बिना किसी दोष के मैं स्वयं को दोषी समझ रही हूँ. "
मेरी तरफ प्रश्न भरी दृष्टी डालकर वह बोली " मैं तो पशु हूँ. कुदरत ने मुझे सोंचने की शक्ति नही दी है. लेकिन तुम इंसान तो सबसे समझदार प्राणी हो. फिर तुम लोगों ने कुछ क्यों नही सोंचा. "
उसकी बात का मेरे पास कोई उत्तर नही था. उससे नज़रें चुराने के लिए मैं इधर उधर देखने लगा. तभी मेरी दृष्टि गांधी जी पर पड़ी. गोल चश्मे के पीछे उनकी आंखों में मुझे उदासी दिखाई पड़ी.


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