क्यूंकि ज़िन्दगी तो फिर भी प्यारी है !
क्यूंकि ज़िन्दगी तो फिर भी प्यारी है !
बस एक ही बात , हमेशा दिल में और दिमाग है , के कितनी भी मुश्किलें , कितनी भी तकलीफों का सामना करना पढ़े , ज़िन्दगी जो है , फिर भी प्यारी है !
दिल्ली में ही पैदाईश हुई और यहीं सारी शिक्षा भी हासिल की ! बचपन से ही पढाई लिखाई , में काफी अच्छा था , और काफी हसमुख मिजाज़ भी , पर साथ में पोलियो और एक ऐसी बीमारी से जूझ रहा था , जिसे स्कोलियोसिस ( एक तरह की स्पाइनल डेफॉर्मिटी ) कहते हैं , इलाज के लिए दिल्ली का कोई सरकारी हॉस्पिटल नहीं छोड़ा , समय समय पर बढ़ी बढ़ी जानलेवा सर्जरी का सामना भी करना पढ़ा और जैसे इन सब की आदत सी हों गयी थी , हालाँकि इन सब की वजह से , कई बार कॉलेज स्कूल भी ड्राप करना पड़ा , कई बार धार्मिक/असक्षमता को लेके स्कूल में एडमिशन के लिए/ समाज में भेदभाओँ का भी सामना किया , पर तब भी हार नहीं मानी ! हालांकि तभी पापा का एक्सीडेंट मेरी ग्रेजुएशन के टाइम पर हुआ और उनको घर बैठना पड़ा , तब घर में माली हालत बिगड़ने लगे और आखिर में फीस के लिए , पीसीओ , टुशंस , मोबाइल रिपेयरिंग वर्क्स , स्कॉलरशिप्स के सहारे , उच्च शिक्षा हासिल कर , दो स्नातकोत्तर ( एम एस सी इन इलेक्ट्रॉनिक्स , एम टेक इन नैनोटेक्नोलाजी ) की उपाधिया हासिल कीं और साथ में बड़ा ( दुसरे नंबर पर ) होने के नाते , घर को भी सँभालने लगा !
हालांकि डॉक्टर बनना चाहता था , पर किस्मत को कुछ और मंज़ूर था , और में इंजीनियर बन गया ! पर इत्तेफ़ाकन पहली नौकरी , दिल्ली के मश्हूर सरकारी हॉस्पिटल में ही मिली जो एक सामान्य श्रेणी के लिए आरक्षित थी , और मुझे अपनी इस पहली नौकरी पर ना सिर्फ गर्व बलके बोहद ख़ुशी भी थी , के यहाँ मेरी असक्षमता को नहीं , मेरी योग्यता को देखा गया ! यहाँ में विभिन प्रकार के दिमागी मरीज़ों की दिमागी जांच करता था , दो साल काम करने के बाद , फिर चार साल इंजीनियर की भूमिका में एक मश्हूर केंद्र सरकारी आर्गेनाइजेशन में बंगलोरे में काम करा ! यहाँ फिर किस्मत ने मोड़ लिया , मेरी तबियत बिगड़ी और में पूरी तरह से व्हीलचेयर और लाइफ सेविंग इंस्ट्रूमेंट्स पर आ गया और मुझे फिर एक और सर्जरी का सामना करना पढ़ा , जिसमें बच पाने की उम्मीद बोहत कम थी , पर हार मानना मैंने नहीं सीखा था , और इन सब दिक्कतों से फिर उबर कर , ज़िन्दगी को फिर नए सिर्रे से स्टार्ट किया ! तब मुझे एहसास हुआ ,के स्कोलियोसिस मरीज़ों के साथ कितनी प्रॉब्लम रहती है , में इस बारे में पढ़ने लगा और एक इसपर वेबसाइट/ब्लॉग स्टार्ट किया जिसका नाम मैंने स्कोलियोसिस इंडिया दिया , जिसको विश्व भर से लोग ना सिर्फ फॉलो करते हैं , बल्कि अपने सवाल भी रखते हैं और इस वेबसाइट/ब्लॉग को बोहत पसंद भी करते हैं ! इसके साथ ही मैंने , एबिलिटी खबरनामा नाम का न्यूज़ पोर्टल भी शुरू करा , जहाँ से विश्व भर में विकलांगता / शारीरिक असक्षःमता को लेके क्या खबरें दिन प्रतिदिन छप रही हैं , उस पर डाली जाती हैं ! अब तक इस पर एक लाख हिट्स के आसपास दर्ज हों चुके हैं और ना सिर्फ भारत में , बल्कि पूरे विश्व में , यह बोहत पसंद की जाती है ! बैंगलोर में रहते ही , में कॅाफ़ी संस्थाओं के साथ जुड़ा जो विकलांगता के मुद्दो पर काम कर रही थीं !
वर्ष 2011 में मेरा नाम बेस्ट एम्प्लोयी विथ डिसेबिलिटी के तौर पर नेशनल अवार्ड के लिए भी नामांकित हुआ और २०१२ में मुझे आई आई एम बंगलौर ने माय चॉइस फॉर इक्वलिटी के तोर पर रेकोगनेशन दी ! वर्ष 2013 से में दिल्ली में , अपने इलाके जफराबाद में फाउंडेशन फॉर इंडियन इंटीग्रेशन एंड राइट्स के फाउंडर के तोर पर , पहले चरण में मुस्लिम लड़कियों को आगे बढ़ाने और उनको सामाजिक मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में काम कर रहा हूँ , क्यूंकि यहाँ लड़कियों की पढाई , उनके अभिवावकों द्वारा बोहत जल्द छुड़वा दी जाती है , जबकि वो बोहत कुछ करना चाहती हैं ! मुझे प्रवाह - UK संस्था की तरफ से ,मेरे सराहनीय काम के लिए , चेंजलूमर के तोर पर चेंजलूम फ़ेलोशिप से भी नवाज़ा गया !
हालांकि , में अब भी लाइफ सेविंग्स इंस्ट्रूमेंट की मदद से अपनी ज़िन्दगी आगे बढ़ा रहा हूँ , पर हँसते हँसते ! मुझे कवितायें लिखना बोहत अच्छा लगता है , चित्र बनाना बोहत पसंद है , और क्रिएटिव काम करना सब से अच्छा लगता है ! स्पाइनल / न्यूरो मरीज़ों को कोउन्सेल्लिंग्स , कर्रिएर कोउन्सेल्लिंग्स , मुस्लिम लड़कियों को निशुल्क इंग्लिश की शिक्षा आदि मेरे रोज़ की दिनचर्या का हिस्सा हैं ! कंप्यूटर से जुड़े हर छोटे बड़े काम , में बाखूबी कर पाता हूँ , दिन कब कैसे विभिन्नं विभिन्न कामो में निकल जाता है ,पता ही नहीं लगता ! मानो कहीं से नहीं लगता के में मशीनो के सहारे पर हूँ या कहीं से भी मुझे कभी महसूस नहीं होता है , कि मेरे अंदर कुछ शारीरिक असक्षमता है !
सब को बस यही कहना चाहूँगा , उतार चढ़ाओ , हर इंसान की ज़िन्दगी का हिस्सा है , किसी की ज़िन्दगी में , कम तो किसी के ज़्यादा , इनसे कभी घबराना नहीं चाहिए , और कभी भी इस बात से निराश ना हों के आप ने ज़िन्दगी से क्या माँगा और आपको वो नहीं मिला , वो रब सब की सुनता है , और उससे मिलता जुलता सबकी झोली में कुछ ना कुछ डाल देता है , बस ज़िन्दगी में सकारत्मक नज़रया और सोच रखिये , क्यूंकि ज़िन्दगी तो फिर भी प्यारी है !
~ फैसल
http://scoliosisindia.blogspot.in/2015/10/danbury-holds-yoga-for-scoliosis.html
मेरे FACEBOOK मित्र फ़ैसल ने अपनी कहानी लिख कर भेजी है। यह कहानी ज़िन्दगी में कभी भी हार ना मानने के ज़ज़बे को दिखाती है। इसे पढ़ें
बस एक ही बात , हमेशा दिल में और दिमाग है , के कितनी भी मुश्किलें , कितनी भी तकलीफों का सामना करना पढ़े , ज़िन्दगी जो है , फिर भी प्यारी है !
दिल्ली में ही पैदाईश हुई और यहीं सारी शिक्षा भी हासिल की ! बचपन से ही पढाई लिखाई , में काफी अच्छा था , और काफी हसमुख मिजाज़ भी , पर साथ में पोलियो और एक ऐसी बीमारी से जूझ रहा था , जिसे स्कोलियोसिस ( एक तरह की स्पाइनल डेफॉर्मिटी ) कहते हैं , इलाज के लिए दिल्ली का कोई सरकारी हॉस्पिटल नहीं छोड़ा , समय समय पर बढ़ी बढ़ी जानलेवा सर्जरी का सामना भी करना पढ़ा और जैसे इन सब की आदत सी हों गयी थी , हालाँकि इन सब की वजह से , कई बार कॉलेज स्कूल भी ड्राप करना पड़ा , कई बार धार्मिक/असक्षमता को लेके स्कूल में एडमिशन के लिए/ समाज में भेदभाओँ का भी सामना किया , पर तब भी हार नहीं मानी ! हालांकि तभी पापा का एक्सीडेंट मेरी ग्रेजुएशन के टाइम पर हुआ और उनको घर बैठना पड़ा , तब घर में माली हालत बिगड़ने लगे और आखिर में फीस के लिए , पीसीओ , टुशंस , मोबाइल रिपेयरिंग वर्क्स , स्कॉलरशिप्स के सहारे , उच्च शिक्षा हासिल कर , दो स्नातकोत्तर ( एम एस सी इन इलेक्ट्रॉनिक्स , एम टेक इन नैनोटेक्नोलाजी ) की उपाधिया हासिल कीं और साथ में बड़ा ( दुसरे नंबर पर ) होने के नाते , घर को भी सँभालने लगा !
हालांकि डॉक्टर बनना चाहता था , पर किस्मत को कुछ और मंज़ूर था , और में इंजीनियर बन गया ! पर इत्तेफ़ाकन पहली नौकरी , दिल्ली के मश्हूर सरकारी हॉस्पिटल में ही मिली जो एक सामान्य श्रेणी के लिए आरक्षित थी , और मुझे अपनी इस पहली नौकरी पर ना सिर्फ गर्व बलके बोहद ख़ुशी भी थी , के यहाँ मेरी असक्षमता को नहीं , मेरी योग्यता को देखा गया ! यहाँ में विभिन प्रकार के दिमागी मरीज़ों की दिमागी जांच करता था , दो साल काम करने के बाद , फिर चार साल इंजीनियर की भूमिका में एक मश्हूर केंद्र सरकारी आर्गेनाइजेशन में बंगलोरे में काम करा ! यहाँ फिर किस्मत ने मोड़ लिया , मेरी तबियत बिगड़ी और में पूरी तरह से व्हीलचेयर और लाइफ सेविंग इंस्ट्रूमेंट्स पर आ गया और मुझे फिर एक और सर्जरी का सामना करना पढ़ा , जिसमें बच पाने की उम्मीद बोहत कम थी , पर हार मानना मैंने नहीं सीखा था , और इन सब दिक्कतों से फिर उबर कर , ज़िन्दगी को फिर नए सिर्रे से स्टार्ट किया ! तब मुझे एहसास हुआ ,के स्कोलियोसिस मरीज़ों के साथ कितनी प्रॉब्लम रहती है , में इस बारे में पढ़ने लगा और एक इसपर वेबसाइट/ब्लॉग स्टार्ट किया जिसका नाम मैंने स्कोलियोसिस इंडिया दिया , जिसको विश्व भर से लोग ना सिर्फ फॉलो करते हैं , बल्कि अपने सवाल भी रखते हैं और इस वेबसाइट/ब्लॉग को बोहत पसंद भी करते हैं ! इसके साथ ही मैंने , एबिलिटी खबरनामा नाम का न्यूज़ पोर्टल भी शुरू करा , जहाँ से विश्व भर में विकलांगता / शारीरिक असक्षःमता को लेके क्या खबरें दिन प्रतिदिन छप रही हैं , उस पर डाली जाती हैं ! अब तक इस पर एक लाख हिट्स के आसपास दर्ज हों चुके हैं और ना सिर्फ भारत में , बल्कि पूरे विश्व में , यह बोहत पसंद की जाती है ! बैंगलोर में रहते ही , में कॅाफ़ी संस्थाओं के साथ जुड़ा जो विकलांगता के मुद्दो पर काम कर रही थीं !
वर्ष 2011 में मेरा नाम बेस्ट एम्प्लोयी विथ डिसेबिलिटी के तौर पर नेशनल अवार्ड के लिए भी नामांकित हुआ और २०१२ में मुझे आई आई एम बंगलौर ने माय चॉइस फॉर इक्वलिटी के तोर पर रेकोगनेशन दी ! वर्ष 2013 से में दिल्ली में , अपने इलाके जफराबाद में फाउंडेशन फॉर इंडियन इंटीग्रेशन एंड राइट्स के फाउंडर के तोर पर , पहले चरण में मुस्लिम लड़कियों को आगे बढ़ाने और उनको सामाजिक मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में काम कर रहा हूँ , क्यूंकि यहाँ लड़कियों की पढाई , उनके अभिवावकों द्वारा बोहत जल्द छुड़वा दी जाती है , जबकि वो बोहत कुछ करना चाहती हैं ! मुझे प्रवाह - UK संस्था की तरफ से ,मेरे सराहनीय काम के लिए , चेंजलूमर के तोर पर चेंजलूम फ़ेलोशिप से भी नवाज़ा गया !
हालांकि , में अब भी लाइफ सेविंग्स इंस्ट्रूमेंट की मदद से अपनी ज़िन्दगी आगे बढ़ा रहा हूँ , पर हँसते हँसते ! मुझे कवितायें लिखना बोहत अच्छा लगता है , चित्र बनाना बोहत पसंद है , और क्रिएटिव काम करना सब से अच्छा लगता है ! स्पाइनल / न्यूरो मरीज़ों को कोउन्सेल्लिंग्स , कर्रिएर कोउन्सेल्लिंग्स , मुस्लिम लड़कियों को निशुल्क इंग्लिश की शिक्षा आदि मेरे रोज़ की दिनचर्या का हिस्सा हैं ! कंप्यूटर से जुड़े हर छोटे बड़े काम , में बाखूबी कर पाता हूँ , दिन कब कैसे विभिन्नं विभिन्न कामो में निकल जाता है ,पता ही नहीं लगता ! मानो कहीं से नहीं लगता के में मशीनो के सहारे पर हूँ या कहीं से भी मुझे कभी महसूस नहीं होता है , कि मेरे अंदर कुछ शारीरिक असक्षमता है !
सब को बस यही कहना चाहूँगा , उतार चढ़ाओ , हर इंसान की ज़िन्दगी का हिस्सा है , किसी की ज़िन्दगी में , कम तो किसी के ज़्यादा , इनसे कभी घबराना नहीं चाहिए , और कभी भी इस बात से निराश ना हों के आप ने ज़िन्दगी से क्या माँगा और आपको वो नहीं मिला , वो रब सब की सुनता है , और उससे मिलता जुलता सबकी झोली में कुछ ना कुछ डाल देता है , बस ज़िन्दगी में सकारत्मक नज़रया और सोच रखिये , क्यूंकि ज़िन्दगी तो फिर भी प्यारी है !
~ फैसल
http://scoliosisindia.blogspot.in/2015/10/danbury-holds-yoga-for-scoliosis.html
मेरे FACEBOOK मित्र फ़ैसल ने अपनी कहानी लिख कर भेजी है। यह कहानी ज़िन्दगी में कभी भी हार ना मानने के ज़ज़बे को दिखाती है। इसे पढ़ें



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