क़ौमी एकता का प्रतीक बनी रामलीला

क़ौमी एकता का प्रतीक बनी रामलीला



संपूर्ण उत्तर भारत में दशहरे के आस पास रामलीला का आयोजन होता है. इसके अंतर्गत भगवान राम के जीवन की घटनाओं को मंचित किया जाता है. बहुत बड़ी संख्या में लोग रामलीला देखने जाते हैं.
यूं तो रामलीला हिंदुओं के आराध्य प्रभु श्री रामचंद्र के जीवन की झांकी प्रस्तुत करती है लेकिन यह हमारी गंगा जमुनी तहज़ीब की मिसाल भी है.
वाराणसी के रामपुर इलाके में बहुसंख्यक मुसलमान समुदाय कई पीढ़ियों से रामलीला के आयोजन में सहायता करता रहा है. यहां रामलीला के मंचन की परंपरा सवा दो सौ साल पुरानी है. इस परंपरा के निर्वाह में मुसलमान समुदाय बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. पात्रों की पोशाक सिलने का काम हो या मंच की सज्जा का सभी काम मुस्लिम बिरादरी द्वारा किए जाते हैं. 
मालटारी के बाजार में पिछले पैंतीस वर्षों से हो रही रामलीला भी हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल है. छह दिनो तक चलने वाली इस रामलीला की शुरुआत 1977 में मुहम्मद अली हसन ने की थी. तब से वही इसका संचालन कर रहे हैं. पूरे क्षेत्र में प्रचलित इस रामलीला को देखने हिंदू मुसलमान बड़ी तादाद में देखने आते हैं.
बिहार के बक्सर जिले के नाटगांव की रामलीला अपने आप में अनोखी है. यहां रामलीला के चरित्रों को हिंदू मुसलमान मिल कर निभाते हैं. अतः मंच पर राम के चरित्र को निभाने वाला एक मुसलमान हो सकता है. इन लोगों का कहना है कि इन चरित्रों को निभाते समय वह उनमे पूर्णतया तल्लीन हो जाते हैं.




राम के नाम पर जहां कुछ लोग समाज को बाटना चाहते हैं वहीं राम का चरित्र कई लोगों को एक कर रहा है. ये  तो चंद उदाहरण हैं जो इस भूमि की विभिन्नता में एकता पिरोने की शक्ति को दर्शाते हैं. ऐसे अनगिनत उदाहरणों से यह देश भरा पड़ा है. आवश्यकता है अपनी उस विरासत को याद रखने की कि सभी रास्ते एक ही मंज़िल को जाते हैं. अतः रास्ते अलग होते हुए भी हम सब एक ही गंतव्य की और जा रहे हैं.

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