हार नही मानूंगा

हार नही मानूंगा
हमारी फौज के जवान सरहद पर बड़ी दिलेरी के साथ हमारी रक्षा करते हैं. देश पर हमला होने पर अपने पराक्रम से दुश्मनों के दांत खट्टे कर देते हैं.  लेकिन सरहद से दूर भी वह अपने हौंसले और हिम्मत से लोगों को प्रोत्साहित करते हैं.
मेजर देवेन्द्र पाल सिंह ऐसे ही हौंसले की मिसाल हैं.





1999 के कारगिल युद्ध के दौरान एक Mortar bomb उनके पास आकर गिरा और फट गया. जब उनके साथी जवान उन्हें लेकर Field hospital पहुँचे तब वह ख़ून से सने हुए थे और बुरी तरह घायल थे. Army surgeon ने उन्हें मृत घोषित कर दिया और उन्हें अस्थाई मुर्दाघर में भेज दिया. Army hospital के एक अन्य डॉक्टर ने उनमें जीवन के क्षीण से लक्षण देखे. हंलाकी Mortar bomb के इतने नज़दीक फटने पर जीवित बच पाना मुश्किल था. उनका पेट खुला हुआ था और आंत का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया था. मजबूरन डॉक्टरों को उनकी आंत निकालनी पड़ी. उनका एक पांव काटना पड़ा किंतु उनकी जिजीविषा के आगे मौत भी हार गई. यह उनकी जीने की चाह ही थी जिसने बम के फटने से पहले उन्हें कूद जाने के लिए प्रेरित किया. अन्यथा उनकी मौके पर ही मौत हो जाती.
इस स्थिति के बावजूद भी उन्होंने हिम्मत नही हारी. इसे ज़िंदगी द्वारा दिए गए मौके की तरह लिया और नए सिरे से जीना प्रारंभ किया. अतः अपनी स्थिति को एक चुनौती की तरह स्वीकार कर जीवन के Front पर नई लड़ाई लड़ने की ठानी. जब सभी को लग रहा था कि वह अब कभी भी अपने पैरों पर खड़े  नही हो पाएेंगे तब मेजर देवेन्द्र पाल ने हार ना मानते हुए दौड़ने की ठानी. हर बार जब वह गिरते तब इसे एक इम्तिहान के तौर पर लेते और पहले से भी अधिक जोश के साथ प्रयत्न में जुट जाते. Prosthetic leg के सहारे दौड़ना कठिन ही नही कष्टदायक भी था. किंतु मेजर लोगों को संदेश देना चाहते थे कि जब तक आप हार ना माने तब तक कुछ भी ज़िंदगी की रफ़्तार को नही रोक सकता है. अतः उन्होंने Marathon race में दौड़ना आरंभ किया. तभी Oklahoma शहर के Hanger clinic के Prosthetic specialist ने उनकी एक Marathon race की Video clip देखी. उन्होंने पाया कि मेजर का Prosthetic leg छोटी दौड़ों के लिए तो ठीक है किंतु Marathon के लिए नही. अतः उन्होंने मेजर को आमंत्रित कर बुलाया और Marathon के उपयुक्त Prosthetic leg लगाया.
मेजर देवेन्द्र पाल भारत के पहले Blade runner ( कृत्रिम पांव के धावक ) हैं और 16 वर्षों में 20 से भी अधिक Marathon दौड़ चुके हैं. इसके अतिरिक्त वह एक Motivational speaker भी हैं. 
अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से उन्होंने इस बात को साबित कर दिया कि हार या जीत मन के संकल्प पर निर्भर है.


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